उत्तराखंड के चमोली जिले में बद्रीनाथ धाम से करीब 3 किलोमीटर आगे बसा माणा कभी भारत का ‘आखिरी गांव’ कहलाता था। अब इसकी पहचान बदल चुकी है और इसे ‘भारत का पहला गांव’ कहा जाता है। सीमा से लगे इस हिमालयी गांव की ऊंचाई करीब 3,200 मीटर है और यहां भोटिया समुदाय की पारंपरिक संस्कृति आज भी दिखाई देती है।
माणा की सबसे बड़ी खासियत यहां दिखाई देने वाली सरस्वती नदी है। चट्टानी दरारों के बीच तेज वेग से बहती सरस्वती आगे अलकनंदा में मिलती है। इस संगम को केशव प्रयाग कहा जाता है। नदी का रौद्र प्रवाह और उसके ऊपर बना प्राकृतिक पत्थर का ‘भीम पुल’ पर्यटकों के लिए बड़ा आकर्षण है।
गांव में व्यास गुफा और गणेश गुफा भी हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार व्यास गुफा में वेदव्यास ने महाभारत का कथन किया और भगवान गणेश ने उसे लिखा। इसी क्षेत्र से पांडवों की स्वर्गारोहण यात्रा जुड़ी होने की मान्यता भी है।
माणा पहुंचने वाले पर्यटकों के लिए यहां का प्रसिद्ध चाय का ठिकाना भी आकर्षण है, जिसे पर्यटन विभाग ‘लास्ट इंडियन टी स्टॉल’ के रूप में उल्लेख करता है। वासुधारा जलप्रपात और हिमालयी रास्ते इसे रोमांच पसंद करने वालों के लिए खास बनाते हैं।
यानी माणा सिर्फ सीमा का गांव नहीं—यह प्रकृति, पौराणिक कथाओं और हिमालयी संस्कृति का ऐसा संगम है, जहां हर मोड़ एक नई कहानी सुनाता है।

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