व्यंग्य .. प्रणव बजाज
स्वतंत्रता दिवस पर देश को सद्भाव, एकता और भाईचारे का पाठ पढ़ाया गया। संदेश भी शानदार था—नफरत की दीवारें तोड़िए, जाति-धर्म के झगड़े छोड़िए, गालीबाज नहीं हुनरबाज बनिए, भ्रष्टाचार से लड़िए और सबको नौकरी के समान अवसर दीजिए। सुनने में इतना अच्छा कि लगा आजादी की 80वीं सालगिरह पर देश ने आखिरकार अपना खोया हुआ आईना खोज लिया।
लेकिन सवाल यह है कि आईना सामने रखेगा कौन?
स्वामी रामदेव ने पतंजलि योगपीठ में कहा कि सड़कों से संसद तक नफरत का वातावरण है और समाज में असमानता बढ़ी है। उन्होंने पेपर लीक रोकने और रोजगार में समान अवसर देने की बात भी कही।
वाह! बात बिल्कुल सही है। बस दिक्कत इतनी है कि भारत में हर बीमारी का इलाज बताने वाले बहुत हैं, लेकिन बीमारी की जांच कराने वाले कम।
पेपर लीक न हों—बिल्कुल। मगर परीक्षा व्यवस्था ऐसी हो कि छात्र किताब खोलें, प्रश्नपत्र नहीं। नौकरी में समान अवसर हों—बिल्कुल। मगर योग्यता की दौड़ में किसी का पैर सिफारिश की मोटरसाइकिल से बंधा न हो।
भ्रष्टाचार जड़ों को खोखला कर रहा है—सही। लेकिन भ्रष्टाचार की जड़ें केवल सरकारी दफ्तरों की फाइलों में नहीं होतीं। वे वहां भी उगती हैं जहां सत्ता, पैसा और प्रभाव मिलकर लोकतंत्र को ‘अपना आदमी’ और ‘दूसरा आदमी’ में बांट देते हैं।
और नफरत? उसका भी कमाल देखिए। चुनाव आते ही भाईचारा अक्सर छुट्टी पर चला जाता है। जाति पूछकर टिकट, धर्म देखकर बयान और भीड़ देखकर राजनीति—फिर स्वतंत्रता दिवस पर सबको सद्भाव का उपदेश!
गांधीजी ने अहिंसा और सद्भाव को भारत की ताकत माना था। आज जरूरत शायद गांधी की तस्वीर पर फूल चढ़ाने से ज्यादा उनके सिद्धांतों को सत्ता, समाज और सड़क—तीनों पर उतारने की है।
क्योंकि भारत को सचमुच कदम मिलाकर चलना है तो पहले यह तय करना होगा कि आगे चलने वाले कौन हैं और पीछे छूटने वालों को कौन साथ लेकर चलेगा।
वरना हर साल भाषण बदलेगा, नारे बदलेंगे, मंच बदलेगा—और जनता वहीं खड़ी रहेगी, ताली बजाते हुए।

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