1063 केस दर्ज… अदालत तक पहुंचे 208, सजा सिर्फ 7 को
प्रणव बजाज
भोपाल। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकायुक्त की कार्रवाई के आंकड़े जितने बड़े हैं, उनके बाद मिलने वाली सजा का आंकड़ा उतना ही छोटा। वर्ष 2022-23 से अब तक लोकायुक्त में 1,063 आपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें 393 मामलों की जांच पूरी हुई, 208 मामलों में चालान पेश किया गया, लेकिन दोषसिद्धि सिर्फ 7 मामलों में हुई। यानी दर्ज मामलों के मुकाबले सजा की दर करीब 0.65 प्रतिशत रही।
यह आंकड़ा उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है, जो भ्रष्टाचार पकड़ तो रही है, लेकिन उसे अंजाम तक पहुंचाने में बेहद धीमी नजर आती है। 134 मामले अभी भी अभियोजन स्वीकृति के इंतजार में बताए गए हैं। सवाल यह है कि जांच एजेंसी कार्रवाई करे, सबूत जुटाए, चालान तैयार हो और फिर मामला स्वीकृति की फाइलों में अटक जाए तो भ्रष्टाचारियों में कानून का डर कैसे पैदा होगा?
छापे पड़ रहे हैं, संपत्ति निकल रही है
हाल के मामलों ने तस्वीर और साफ की है। इंदौर में नगर निगम के सहायक राजस्व अधिकारी जितेंद्र कुमार पांडेय के ठिकानों पर लोकायुक्त की कार्रवाई में पत्नी के नाम दो बड़े भवन और छात्रावास सहित संपत्तियों की जांच सामने आई। प्रारंभिक आकलन में आय और संपत्ति के बीच बड़ा अंतर बताया गया है।
इसी तरह इंदौर में महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मीनारायण कंडवाल के मामले में लोकायुक्त ने करीब 9.50 करोड़ रुपये की संपत्तियों की जानकारी सामने आने की बात कही। प्रारंभिक जांच में उनकी ज्ञात आय की तुलना में संपत्ति काफी अधिक बताई गई।
सिवनी-जबलपुर में सरकारी क्लर्क सुभाष शर्मा के खिलाफ कार्रवाई में आय से 543 प्रतिशत अधिक संपत्ति होने का आरोप सामने आया। वहीं एमवाय अस्पताल के फार्मासिस्ट राकेश गोरखे के खिलाफ आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में कार्रवाई की।
अब लोकायुक्त से बड़ा सवाल
छापे के बाद करोड़ों की संपत्ति और दस्तावेज मिलते हैं। मामले दर्ज होते हैं। जांच भी होती है। लेकिन जब 1,063 मामलों के मुकाबले अदालत से सिर्फ 7 दोषसिद्धियां सामने आएं तो सवाल उठना स्वाभाविक है—कमी जांच में है, अभियोजन में है, स्वीकृति व्यवस्था में है या पूरी प्रक्रिया ही इतनी धीमी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का असर खत्म हो जाता है?
और सबसे अहम सवाल सत्ता से—क्या अभियोजन स्वीकृति की व्यवस्था को समयबद्ध किया जाएगा? क्या बड़े अधिकारियों के मामलों की निगरानी होगी?
राजनीतिक संरक्षण के आरोप के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। लेकिन आंकड़े सरकार से जवाब मांगने के लिए पर्याप्त हैं।
लोकायुक्त छापे मार रहा है… अफसर पकड़े जा रहे हैं… संपत्ति सामने आ रही है… फिर सजा की कतार इतनी छोटी क्यों है?
यही सवाल अब लोकायुक्त से भी है और सरकार से भी।

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