Top News

मोहन के दांत खाने के अलग और दिखाने के अलग

 


संकल्प पत्र, सरकारी दावे, अधूरे वादे, बढ़ता कर्ज और उज्जैन की जमीन तक… मोहन सरकार के ढाई साल का हिसाब


प्रणव बजाज

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार अपने कार्यकाल के ढाई साल से ज्यादा समय पूरे कर चुकी है। सरकार विकास, निवेश, रोजगार, किसान कल्याण और महिला सशक्तिकरण की उपलब्धियां गिना रही है। दूसरी ओर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में जनता से किए गए बड़े-बड़े संकल्पों में आखिर कितने पूरे हुए और कितने अभी भी घोषणा, प्रक्रिया या भविष्य के भरोसे पर टिके हैं।



इस पड़ताल में सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आती है कि सरकार के कई दावे पूरी तरह झूठे नहीं हैं, लेकिन कई चुनावी संकल्प भी अभी अपने घोषित लक्ष्य तक नहीं पहुंचे हैं। वहीं उज्जैन की जमीन का मामला ऐसा विवाद है, जिसमें आरोपों से ज्यादा जरूरी है कि जमीन के दस्तावेज, सरकारी परियोजनाओं और जमीन के उपयोग परिवर्तन के बीच संबंध की स्वतंत्र जांच हो।


यानी असली सवाल राजनीतिक नारे का नहीं, हिसाब का है।




पहला सवाल : हर परिवार में रोजगार कहां है?


भाजपा के 2023 के मध्य प्रदेश संकल्प-पत्र में प्रत्येक परिवार में कम से कम एक रोजगार अथवा स्वरोजगार का अवसर सुनिश्चित करने का संकल्प लिया गया था। इसी चुनावी दस्तावेज में किसानों, गरीब परिवारों, महिलाओं, आदिवासियों और युवाओं के लिए भी बड़े लक्ष्य रखे गए थे।


बाद में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पांच वर्षों में 2.50 लाख सरकारी नौकरियां देने का लक्ष्य भी दोहराया। नवंबर 2025 में सरकार ने बताया था कि 11 हजार से अधिक युवाओं को नियुक्ति पत्र दिए जा चुके हैं और करीब एक लाख पदों पर भर्ती प्रक्रिया चल रही है।


लेकिन यहां एक जरूरी तथ्यात्मक सुधार है।


यह कहना कि सरकार ने दो वर्षों में केवल 11 हजार नौकरियां दीं, अब पूरी तरह सही नहीं है। 15 अगस्त 2026 के मुख्यमंत्री के भाषण के अनुसार 85 हजार से अधिक युवाओं की सरकारी सेवाओं में नियुक्ति हो चुकी है और आने वाले समय में एक लाख से अधिक युवाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार देने का लक्ष्य बताया गया है। साथ ही सरकार ने उद्योग और उद्यमिता के जरिए लाखों प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार बनने का दावा किया है।


फिर भी सवाल खत्म नहीं होता।


2.50 लाख का लक्ष्य पांच साल का है तो सरकार को आज तक की भर्ती का विभागवार, पदवार और नियुक्तिवार सार्वजनिक हिसाब देना चाहिए।


क्योंकि चुनावी संकल्प था हर परिवार में रोजगार अथवा स्वरोजगार का अवसर। सरकारी नियुक्तियों की संख्या और हर परिवार को रोजगार मिलने की स्थिति दो अलग बातें हैं।




दूसरा सवाल : गेहूं 2700 और धान 3100 का क्या हुआ?


2023 के भाजपा संकल्प-पत्र में गेहूं की खरीद 2700 रुपये प्रति क्विंटल और धान की खरीद 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से करने का वादा किया गया था।


गेहूं के मामले में सरकार अभी लक्ष्य से पीछे है।


2025-26 में मध्य प्रदेश में गेहूं की प्रभावी खरीद कीमत 2600 रुपये प्रति क्विंटल रही। 2026-27 में केंद्र का गेहूं एमएसपी 2585 रुपये हुआ और मध्य प्रदेश ने 40 रुपये बोनस घोषित किया, जिससे प्रभावी कीमत 2625 रुपये प्रति क्विंटल हुई। यानी घोषित 2700 रुपये से अभी 75 रुपये कम।


जनवरी 2026 में मुख्यमंत्री ने कहा कि गेहूं की खरीद कीमत को चरणबद्ध तरीके से 2700 रुपये तक ले जाया जाएगा। इसका अर्थ यह है कि 2023 के संकल्प को तत्काल पूरा हुआ नहीं माना जा सकता; सरकार अब इसे भविष्य के लक्ष्य के रूप में आगे बढ़ा रही है।


धान के मामले में भी 3100 रुपये की चुनावी घोषणा के अनुरूप मध्य प्रदेश में सार्वभौमिक खरीद का स्पष्ट वर्तमान ढांचा सामने नहीं आता। इसलिए इस वादे का पूरा हिसाब सरकार को जिला और खरीदी केंद्र स्तर पर देना चाहिए।




तीसरा सवाल : लाड़ली बहना 3000 तक कब?


चुनाव के दौरान भाजपा ने लाड़ली बहना की राशि को आगे बढ़ाकर 3000 रुपये प्रतिमाह तक ले जाने का भरोसा दिया था। 2023 में राशि 1250 रुपये थी।


आज स्थिति बदल चुकी है।


2026 में नियमित राशि 1500 रुपये प्रतिमाह हो चुकी है। 19 अगस्त 2026 को रक्षाबंधन के अवसर पर 250 रुपये की अतिरिक्त राशि के कारण उस महीने महिलाओं के खातों में 1750 रुपये पहुंचे। लगभग 1.25 करोड़ महिलाएं योजना से जुड़ी होने का सरकार का दावा है।


लेकिन 3000 रुपये का लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ।


यानी यहां भी सरकार योजना चला रही है, भुगतान कर रही है, राशि बढ़ा चुकी है, लेकिन चुनावी संकल्प में बताई गई 3000 रुपये की मंजिल अभी दूर है।




चौथा सवाल : आदिवासी समाज के तीन लाख करोड़ का हिसाब?


भाजपा के संकल्प-पत्र में अगले पांच वर्षों में जनजातीय समुदाय के सशक्तिकरण के लिए तीन लाख करोड़ रुपये खर्च करने का संकल्प लिया गया था। भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी इस राशि को सार्वजनिक रूप से रेखांकित किया था।


यहां सबसे बड़ा सवाल आरोप का नहीं बल्कि पारदर्शिता का है।


सरकार को बताना चाहिए—



तीन लाख करोड़ में से अब तक कितनी राशि खर्च हुई?


कौन-कौन से विभागों में खर्च हुई?


आदिवासी परिवारों तक सीधे कितनी राशि पहुंची?


कितने विद्यालय, अस्पताल और छात्रावास बने?


कितने आदिवासी युवाओं को रोजगार मिला?


कितने गांवों में पेयजल और सिंचाई पहुंची?




जब तक इन सवालों का समेकित पांच-वर्षीय लक्ष्य बनाम उपलब्धि विवरण सार्वजनिक नहीं होता, इस संकल्प को पूरा हुआ मानना जल्दबाजी होगी।




पांचवां सवाल : गरीबों की मुफ्त शिक्षा और हर बेघर को घर


भाजपा के संकल्प-पत्र में गरीब परिवारों के बच्चों को 12वीं तक मुफ्त शिक्षा और बेघर परिवारों के लिए आवास का संकल्प था। मुख्यमंत्री जन आवास योजना तथा प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से सरकार ने आवास निर्माण का काम आगे बढ़ाया है।


इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि आवास पर सरकार ने कोई काम नहीं किया।


लेकिन चुनावी वादा था “कोई बेघर नहीं रहेगा”।


सवाल यह है कि मध्य प्रदेश में आज की तारीख में—


कुल बेघर परिवार कितने हैं और उनमें से कितनों को वास्तव में पक्का मकान मिल चुका है?


इसी तरह 12वीं तक मुफ्त शिक्षा के संकल्प की स्थिति पर सरकार को सरकारी और निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले पात्र गरीब विद्यार्थियों का आंकड़ा और वास्तविक लाभार्थियों की संख्या सार्वजनिक करनी चाहिए।




अब सबसे गंभीर अध्याय : उज्जैन की जमीन


जून 2026 में द इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया।


रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री बनने के बाद दिसंबर 2023 से दिसंबर 2025 के बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार और उनसे जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों ने उज्जैन में कम से कम 137 प्लॉट, कुल 168 एकड़, लगभग 45 करोड़ रुपये में खरीदे। रिपोर्ट के अनुसार इनमें से करीब 111 एकड़ जमीन उन क्षेत्रों के आसपास है जहां सरकार की सड़क या बुनियादी ढांचा परियोजनाएं घोषित हुईं।


रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि परिवार की जमीनें उज्जैन मास्टर प्लान 2035 में कृषि भूमि से आवासीय अथवा व्यावसायिक उपयोग में परिवर्तन वाले कई क्षेत्रों से जुड़ती हैं।


यही वह बिंदु है जहां मामला राजनीतिक आरोप से आगे बढ़कर हितों के टकराव की जांच का विषय बन जाता है।


क्योंकि सवाल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति या परिवार को जमीन खरीदने का अधिकार है या नहीं।


सवाल यह है—


क्या सरकारी परियोजना की जानकारी, सड़क का मार्ग, जमीन का उपयोग परिवर्तन और निजी जमीन की खरीद के बीच कोई अनुचित संबंध था?


अगर नहीं था तो स्वतंत्र जांच के बाद यह बात साफ होनी चाहिए।


अगर था तो जवाबदेही तय होनी चाहिए।


सरकार का जवाब भी उतना ही महत्वपूर्ण


मुख्यमंत्री कार्यालय ने इन आरोपों को खारिज किया है।


मुख्यमंत्री की ओर से जारी जवाब के अनुसार नवंबर 2023 में मुख्यमंत्री की घोषित कृषि भूमि 17.967 एकड़ थी और जून 2026 में भी लगभग उतनी ही रही। मुख्यमंत्री कार्यालय ने यह भी कहा कि उनकी पत्नी की जमीन में भी लगभग कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हुआ।


सरकार का कहना है कि उज्जैन मास्टर प्लान 2035 मई 2023 में लागू हो चुका था, जबकि मोहन यादव 13 दिसंबर 2023 को मुख्यमंत्री बने। सरकार के अनुसार इसलिए यह कहना गलत है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद मास्टर प्लान उनके परिवार को फायदा पहुंचाने के लिए बनाया गया।


सरकार ने यह भी कहा कि रिश्तेदारों के स्वतंत्र जमीन कारोबार को मुख्यमंत्री के कार्यालय से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से गलत है।


यह पक्ष खबर में उतना ही महत्वपूर्ण है जितना विपक्ष का आरोप।


लेकिन इससे एक सवाल और पैदा होता है—


अगर सभी सौदे कानूनी हैं तो सरकार स्वतंत्र जांच से क्यों न स्पष्ट कर दे कि कहीं कोई सरकारी निर्णय किसी पारिवारिक जमीन के मूल्य को असामान्य रूप से बढ़ाने वाला तो नहीं था?


स्वतंत्र जांच आरोप को भी खत्म कर सकती है और संदेह को भी।


बढ़ता कर्ज : विकास की कीमत या वित्तीय दबाव?


यहां भी आपके दिए आंकड़े को अपडेट करना जरूरी है।


फरवरी 2026 में मध्य प्रदेश का कुल कर्ज लगभग 4.90 लाख करोड़ रुपये बताया गया था। उसी समय राज्य ने 5600 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया था।


लेकिन आरबीआई के बजट अनुमानों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 तक मध्य प्रदेश की कुल बकाया देनदारियां लगभग 5.31 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई थीं। यह पिछले वर्ष के मुकाबले लगभग 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक की वृद्धि थी।


2026-27 के बजट विश्लेषण में भी राज्य की बकाया देनदारियां वर्ष के अंत तक सकल राज्य घरेलू उत्पाद के 32.5 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। वित्तीय घाटा 71,458 करोड़ रुपये यानी 3.9 प्रतिशत जीएसडीपी अनुमानित है।


यानी “मध्य प्रदेश पर 4.75 से 5 लाख करोड़ का कर्ज” कहना अब पुराना आंकड़ा है।


नई तस्वीर इससे भी बड़ी है।


सवाल यह नहीं कि कर्ज लेना गलत है या सही।


सवाल है—


कर्ज से बनी संपत्ति और कर्ज से चल रहे खर्च का अनुपात क्या है?


और दूसरा—


क्या आने वाली सरकारों और आने वाली पीढ़ियों पर इसकी कीमत कितनी पड़ेगी?




एक और चौंकाने वाला आंकड़ा : 19,897 उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित


मध्य प्रदेश के वित्तीय प्रबंधन पर नजर डालने पर एक और गंभीर तथ्य सामने आता है।


2025 की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2024 तक 19,897 उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित थे। इनसे जुड़े अनुदानों की राशि लगभग 22,049 करोड़ रुपये थी। इनमें 13,607 करोड़ रुपये से जुड़े प्रमाणपत्र नौ साल से अधिक समय से लंबित बताए गए।


यह अपने आप में घोटाला साबित नहीं करता।


लेकिन यह जरूर बताता है कि सरकार को यह बताने की जरूरत है कि जनता के पैसे का उपयोग कहां हुआ और उसका प्रमाण समय पर क्यों नहीं दिया गया।




सरकार का बचाव : पांच साल का कार्यकाल अभी बाकी


सरकार का सबसे मजबूत तर्क यही है कि संकल्प-पत्र पांच वर्ष के लिए था और कार्यकाल अभी पूरा नहीं हुआ है।


यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।


सरकार ने रोजगार, निवेश, उद्योग, किसान कल्याण और महिला योजनाओं में कई कदम उठाए हैं। 15 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री ने बताया कि 85 हजार से अधिक युवाओं की सरकारी सेवाओं में नियुक्ति हो चुकी है, 3.34 लाख से अधिक उद्यम पंजीकृत हुए हैं और 33.80 लाख से अधिक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार अवसर बनने का दावा किया गया है।


लेकिन चुनावी वादे की समीक्षा करने के लिए केवल घोषणा काफी नहीं।


लक्ष्य बनाम उपलब्धि का हिसाब चाहिए।




असली सवाल : घोषणा बनाम परिणाम


मोहन यादव सरकार की तस्वीर को अगर एक ही नजर में देखा जाए तो चार अलग-अलग तस्वीरें दिखाई देती हैं।


पहली तस्वीर: सरकार बड़ी घोषणाएं कर रही है।


दूसरी तस्वीर: कई योजनाएं जमीन पर चल भी रही हैं।


तीसरी तस्वीर: कुछ बड़े चुनावी लक्ष्य अभी पूरे नहीं हुए हैं।


चौथी तस्वीर: उज्जैन जमीन विवाद और बढ़ती देनदारियों जैसे मुद्दे सरकार से पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।


इसलिए इसे केवल कांग्रेस बनाम भाजपा का राजनीतिक विवाद मानना आसान है, लेकिन असली मुद्दा इससे बड़ा है।




जनता का सवाल : वादा कब पूरा होगा?


गेहूं के मामले में लक्ष्य 2700 था, वर्तमान प्रभावी खरीद 2625 रुपये तक पहुंची है। लाड़ली बहना में लक्ष्य 3000 था, नियमित राशि 1500 रुपये है। रोजगार में 2.50 लाख का पांच-वर्षीय लक्ष्य है और सरकार के अनुसार 85 हजार से ज्यादा सरकारी नियुक्तियां हो चुकी हैं। आदिवासी समाज के लिए तीन लाख करोड़ के पांच-वर्षीय संकल्प का समेकित खर्च और परिणाम सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। आवास और मुफ्त शिक्षा में काम हुआ है, लेकिन “हर बेघर को घर” और सार्वभौमिक लाभ का अंतिम आंकड़ा सामने आना बाकी है।


यानी सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बताने की जरूरत नहीं।


जो पूरा हुआ है, उसे पूरा कहिए। जो अधूरा है, उसे अधूरा कहिए। और जिस पर आरोप है, उसकी जांच करा दीजिए।


यही लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा है।




निष्कर्ष : सवाल मोहन यादव से नहीं, सत्ता की पारदर्शिता से है


“मोहन के दांत खाने के अलग और दिखाने के अलग” एक राजनीतिक व्यंग्य हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक पत्रकारिता का काम किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि उसके सामने दस्तावेज रखकर सवाल पूछना है।


और आज मध्य प्रदेश के सामने सबसे बड़े सवाल यही हैं—


2700 का गेहूं कब?


3100 का धान कब?


3000 की लाड़ली बहना कब?


हर परिवार को रोजगार कब?


तीन लाख करोड़ आदिवासी पैकेज का वास्तविक हिसाब कहां है?


हर बेघर को मकान कब?


मुफ्त शिक्षा का वास्तविक लाभ कितने गरीब बच्चों को मिला?


5.31 लाख करोड़ की देनदारी का बोझ कहां तक जाएगा?


और सबसे बड़ा सवाल—


उज्जैन की जमीन और सरकारी विकास परियोजनाओं के बीच उठे सवालों की स्वतंत्र जांच क्यों न हो?


इन सवालों के जवाब कांग्रेस को नहीं, भाजपा को नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की जनता को चाहिए।


क्योंकि चुनाव के समय संकल्प पत्र जनता के सामने रखा गया था।


अब समय है कि उसी संकल्प पत्र की पंक्ति-दर-पंक्ति प्रगति रिपोर्ट भी जनता के सामने रखी जाए।

Post a Comment

Previous Post Next Post