नई दिल्ली। देश के दो बहुप्रतीक्षित हवाई अड्डे—नोएडा और नवी मुंबई—पर परिचालन की तैयारियां लगभग पूरी हैं, लेकिन विदेशी एयरलाइंस का रुख अब भी सतर्क बना हुआ है। आधुनिक सुविधाओं से लैस इन एयरपोर्टों के बावजूद अधिकांश अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनियां फिलहाल अपने मौजूदा नेटवर्क को छोड़ने के पक्ष में नहीं दिख रही हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक सबसे बड़ी वजह उच्च उपयोग शुल्क (यूजर फीस) और उससे यात्रियों पर पड़ने वाला अतिरिक्त खर्च है। यदि एयरलाइंस को अधिक शुल्क देना पड़ता है तो उसका असर टिकटों की कीमत पर भी पड़ सकता है, जिससे यात्रियों की संख्या प्रभावित होने की आशंका रहती है।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस पहले से दिल्ली और मुंबई जैसे स्थापित हवाई अड्डों पर मजबूत नेटवर्क, बेहतर कनेक्टिविटी और नियमित यात्री आधार के साथ काम कर रही हैं। ऐसे में नए एयरपोर्ट पर परिचालन शुरू करना उनके लिए व्यावसायिक रूप से जोखिम भरा फैसला माना जा रहा है।
विमानन क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि नए एयरपोर्टों पर पर्याप्त यात्री संख्या, प्रतिस्पर्धी शुल्क और बेहतर अंतरराष्ट्रीय संपर्क विकसित होने के बाद ही विदेशी एयरलाइंस बड़े पैमाने पर यहां से उड़ानें शुरू करने का निर्णय लेंगी।
हालांकि, उम्मीद जताई जा रही है कि जैसे-जैसे इन हवाई अड्डों पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय परिचालन बढ़ेगा, एयरलाइंस की रुचि भी बढ़ेगी और आने वाले वर्षों में नोएडा तथा नवी मुंबई देश के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विमानन केंद्रों के रूप में उभर सकते हैं।

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