अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के पहले पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी के चयन की प्रक्रिया शुरू हो गई है। 5,300 से अधिक आवेदनों में से 18 उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए चुना गया है। पहले चरण में पूर्व आईएएस, आईपीएस, सैन्य और अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
साक्षात्कार में प्रशासनिक अनुभव, मंदिर प्रबंधन, भीड़ नियंत्रण और राम मंदिर के विकास को लेकर उम्मीदवारों की सोच पर सवाल किए गए। लेकिन चर्चा उन सवालों की ज्यादा है, जो उम्मीदवारों की व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं और जीवनशैली से जुड़े थे।
रिपोर्टों के मुताबिक उम्मीदवारों से पूछा गया कि वे शाकाहारी हैं या मांसाहारी, शराब का सेवन करते हैं या नहीं, जनेऊ पहनते हैं या नहीं और शिखा रखते हैं या नहीं। भगवान राम के प्रति उनकी आस्था और हिंदू धार्मिक परंपराओं के अनुरूप जीवनशैली को लेकर भी सवाल पूछे गए।
सीईओ का पद केवल धार्मिक प्रतीकों तक सीमित नहीं होगा। इस अधिकारी के जिम्मे मंदिर का प्रशासन, वित्तीय व्यवस्था, कानूनी मामले, सुरक्षा, श्रद्धालुओं की सुविधाएं और बड़े आयोजनों का प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण काम होंगे।
यहीं से एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आता है—क्या राम मंदिर जैसे धार्मिक संस्थान के शीर्ष प्रशासनिक पद के लिए धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत जीवनशैली की जांच जरूरी है, या प्रशासनिक दक्षता को प्राथमिक कसौटी होना चाहिए?
मंदिर की परंपराओं और धार्मिक भावनाओं की समझ निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन किसी उम्मीदवार की योग्यता का आकलन करते समय उसके प्रशासनिक अनुभव, ईमानदारी, निर्णय क्षमता, वित्तीय पारदर्शिता और संकट प्रबंधन जैसे पहलुओं का महत्व भी कम नहीं किया जा सकता।
राम मंदिर का सीईओ केवल एक पदाधिकारी नहीं होगा। वह देश के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक की व्यवस्था संभालेगा। इसलिए चयन की असली कसौटी यही होनी चाहिए कि क्या चुना गया व्यक्ति आस्था और आधुनिक प्रशासन—दोनों के बीच संतुलन कायम कर सकता है?

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