88,634 करोड़ की सड़क योजना पर बड़ा सवाल—जनता का पैसा सड़क बनाएगा या ठेकेदारों का साम्राज्य?
प्रणव बजाज
मध्यप्रदेश सरकार अगले पांच वर्षों में 29,682 किलोमीटर सड़कों के निर्माण और उन्नयन पर 88,634 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बना रही है। वर्ष 2026-27 से 2030-31 के रोड मास्टर प्लान में 1,226 मार्ग शामिल किए गए हैं। इसके अलावा सात ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे के पहले चरण की अनुमानित लागत ही 38,456 करोड़ रुपये बताई गई है।
सड़कें बनना विकास का जरूरी हिस्सा हैं। सवाल सड़क बनाने पर नहीं है।
सवाल उस व्यवस्था पर है जिसमें राज्य पर कर्ज बढ़ रहा है, ब्याज का बोझ बढ़ रहा है, लेकिन ठेके और निर्माण परियोजनाओं की रफ्तार उससे भी तेज दिखाई दे रही है।
मध्यप्रदेश के 2026-27 के बजट में राजकोषीय घाटा 71,458 करोड़ रुपये यानी जीएसडीपी का 3.9 प्रतिशत अनुमानित है। राज्य की बकाया देनदारियां 2026-27 के अंत तक जीएसडीपी के 32.5 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। केवल ब्याज भुगतान के लिए ही 33,735 करोड़ रुपये का प्रावधान है।
तो सवाल सीधा है—
जब जनता कर्ज का ब्याज चुकाएगी, तब क्या सरकार यह गारंटी देगी कि जिस सड़क पर पैसा खर्च होगा, वह अपनी निर्धारित उम्र तक टिकेगी?
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88,634 करोड़ का सवाल
सरकार का तर्क है कि बेहतर सड़कें उद्योग, निवेश, पर्यटन, कृषि और रोजगार को बढ़ावा देंगी।
तर्क सही है।
लेकिन सड़क का पहला धर्म है—टिकना।
यदि करोड़ों रुपये खर्च करके सड़क बनाई जाए और कुछ ही समय बाद उसकी परत उखड़ने लगे, गड्ढे बनने लगें या फिर उसी सड़क की मरम्मत के लिए नया बजट निकालना पड़े तो सवाल केवल निर्माण का नहीं, पूरी ठेका व्यवस्था की जवाबदेही का है।
और यहां सरकार के सामने एक असहज तथ्य पहले से मौजूद है।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की मध्यप्रदेश की सड़क व्यवस्था पर रिपोर्ट फरवरी 2026 में विधानसभा के पटल पर रखी गई। इसमें 2018-19 से 2022-23 तक लोक निर्माण विभाग की सड़क परियोजनाओं का प्रदर्शन परीक्षण किया गया।
सीएजी की रिपोर्ट में कुछ नई बनी सड़कों की सतह के खराब होने और पुनर्निर्माण की जरूरत जैसी गंभीर टिप्पणियां दर्ज हैं। एक मामले में हाल में बनी सड़क की डीबीएम और बीसी परत पूरी तरह क्षतिग्रस्त पाई गई।
यानी सवाल काल्पनिक नहीं है।
सड़क की गुणवत्ता पर सरकारी लेखा-परीक्षा पहले ही सवाल उठा चुकी है।
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एक साल में सड़क खराब हुई तो जिम्मेदार कौन?
सरकार कहेगी—ठेकेदार जिम्मेदार है।
ठेकेदार कहेगा—बारिश असामान्य थी।
अधिकारी कहेंगे—गुणवत्ता की जांच हुई थी।
फिर सड़क कहेगी—
“मैं तो अभी बनी ही थी!”
यही वह मजाक है जिसे जनता वर्षों से झेल रही है।
सड़क बनती है।
उद्घाटन होता है।
फोटो खिंचती है।
पट्टिका लगती है।
कुछ समय बाद सड़क टूटती है।
फिर मरम्मत का प्रस्ताव आता है।
फिर नया टेंडर।
फिर नया भुगतान।
और जनता फिर उसी गड्ढे से गुजरती है।
सड़क वही, गड्ढा वही, पैसा नया!
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भोपाल–विदिशा: 1,758 करोड़ का नया अध्याय
ताजा प्रस्ताव के मुताबिक भोपाल–विदिशा मार्ग के 44.83 किलोमीटर हिस्से को चार लेन किया जाना है। परियोजना की लागत करीब 1,758 करोड़ रुपये बताई गई है और इसमें तीन बायपास भी प्रस्तावित हैं। परियोजना को मंत्रिपरिषद की मंजूरी के लिए रखा जाना है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है—
अभी इस परियोजना का ठेका किसी कंपनी को मिला नहीं है।
इसलिए इस परियोजना में किसी ठेकेदार को अभी से लाभार्थी बताना गलत होगा।
लेकिन असली पड़ताल यहीं से शुरू होनी चाहिए।
मंत्रिपरिषद मंजूरी देगी।
फिर निविदा निकलेगी।
फिर तकनीकी और वित्तीय बोली आएगी।
फिर कौन कंपनी पात्र होगी?
किसकी निविदा सबसे कम होगी?
किसे काम मिलेगा?
किस कंपनी का पिछला काम कैसा रहा?
किस कंपनी पर जांच या कार्रवाई हुई?
किस कंपनी ने राजनीतिक दलों को कितना चंदा दिया?
इन सभी सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
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एक ठेका खोलता है ठेकेदारी की पूरी तस्वीर
उज्जैन–जावरा नियंत्रित प्रवेश वाले चार लेन मार्ग की निविदा इसका एक दिलचस्प उदाहरण है।
एमपीआरडीसी की इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 2,029.49 करोड़ रुपये थी। उपलब्ध निविदा परिणाम के अनुसार बंसल कंस्ट्रक्शन वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड सबसे कम बोलीदाता रहा और 1,676.36 करोड़ रुपये की बोली के साथ विजेता बना।
यानी अनुमानित लागत की तुलना में करीब 17.4 प्रतिशत कम बोली।
कम बोली लगाना अपने आप में भ्रष्टाचार नहीं है।
लेकिन सवाल है—
क्या इतनी कम बोली में गुणवत्ता, सामग्री, श्रम, रखरखाव और निर्धारित समयसीमा का पूरा खर्च वास्तविक रूप से शामिल है?
यदि हां, तो सरकार को जनता के सामने इसकी पूरी लागत संरचना बतानी चाहिए।
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इस एक निविदा में कौन-कौन बड़े खिलाड़ी थे?
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