1. बंसल कंस्ट्रक्शन वर्क्स — 1,676.36 करोड़ रुपये — विजेता
2. सीडीएस इंफ्रा प्रोजेक्ट्स — 1,962 करोड़
3. पीएनसी इंफ्राटेक — 1,980 करोड़
4. गावर कंस्ट्रक्शन — 1,994.99 करोड़
5. एमकेसी इंफ्रास्ट्रक्चर — 1,998.98 करोड़
6. जीआर इंफ्राप्रोजेक्ट्स — 2,054.77 करोड़
7. बृज गोपाल कंस्ट्रक्शन — 2,125 करोड़
8. शिवालया कंस्ट्रक्शन — 2,144.70 करोड़
9. अशोका बिल्डकॉन — 2,237 करोड़
10. दिलीप बिल्डकॉन — 2,295 करोड़
11. वीआरसी कंस्ट्रक्शंस — 2,313.09 करोड़
12. काल्थिया इंजीनियरिंग एंड कंस्ट्रक्शन — 2,507 करोड़
13. दिनेशचंद्र आर. अग्रवाल इंफ्राकॉन — 2,583 करोड़।
यही सूची बताती है कि प्रदेश के बड़े सड़क ठेकों का मैदान किन बड़े खिलाड़ियों से भरा हुआ है।
अब आया सबसे असहज सवाल—राजनीतिक चंदा
यहां खबर को आरोप से नहीं, दस्तावेज से पढ़ना होगा।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के माध्यम से उपलब्ध चुनावी चंदे के आंकड़ों में 2023-24 में दिनेशचंद्र आर. अग्रवाल इंफ्राकॉन प्राइवेट लिमिटेड ने भाजपा को 30 करोड़ रुपये का चंदा घोषित किया था। यही कंपनी उज्जैन–जावरा सड़क परियोजना की निविदा में शामिल थी और उसकी बोली 2,583 करोड़ रुपये थी।
यह तथ्य अपने आप में किसी ठेके के बदले राजनीतिक भुगतान साबित नहीं करता।
लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार तो पैदा करता है—
एक तरफ 30 करोड़ रुपये का राजनीतिक चंदा और दूसरी तरफ हजारों करोड़ रुपये की सरकारी निविदाओं में भागीदारी—क्या सरकार इस संबंध का पूरा सार्वजनिक खुलासा करेगी?
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पीएनसी इंफ्राटेक पर भी गंभीर सवाल
उसी उज्जैन–जावरा परियोजना में पीएनसी इंफ्राटेक की बोली 1,980 करोड़ रुपये थी।
पीएनसी से जुड़े मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के 2024 के फैसले में दर्ज है कि एनएचएआई ने कंपनी के खिलाफ कथित भ्रष्ट आचरण को लेकर कार्रवाई की थी। अदालत के रिकॉर्ड में 2024 की प्राथमिकी और आरोपपत्र में एनएचएआई अधिकारियों को कथित अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए रिश्वत संबंधी आरोपों और सीसीटीवी/बातचीत जैसे साक्ष्यों का उल्लेख है।
और आज अगस्त 2026 में पीएनसी एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। नए लखनऊ–कानपुर एक्सप्रेसवे पर गुणवत्ता संबंधी गंभीर समस्या के बाद एनएचएआई ने उसके खिलाफ गैर-निष्पादक ठेकेदार घोषित करने की कार्रवाई शुरू की और टोल संग्रह भी निलंबित किया गया।
यह मध्यप्रदेश की वर्तमान परियोजना में भ्रष्टाचार साबित नहीं करता।
लेकिन ठेकेदार के पिछले प्रदर्शन की जांच कितनी गंभीरता से होती है, यह सवाल जरूर पैदा करता है।
बंसल कंस्ट्रक्शन—विजेता और चंदे का रिकॉर्ड
उज्जैन–जावरा परियोजना का विजेता बंसल कंस्ट्रक्शन वर्क्स है।
मायनेटा के उपलब्ध 2024-25 भाजपा चंदा रिकॉर्ड में बंसल कंस्ट्रक्शन वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड के नाम से एक लाख रुपये का योगदान दर्ज है।
यह राशि 30 करोड़ या 13 करोड़ की तुलना में बहुत छोटी है।
फिर भी इसे छिपाने की जरूरत नहीं।
चंदा चंदा है, ठेका ठेका है—लेकिन दोनों का सार्वजनिक रिकॉर्ड जनता के सामने होना चाहिए।
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सबसे बड़ा सवाल—क्या सड़क निर्माण और राजनीतिक चंदे के बीच कोई रिश्ता है?
अभी उपलब्ध दस्तावेज इससे कोई सीधा रिश्ता साबित नहीं करते।
और यही जिम्मेदार पत्रकारिता का बिंदु है।
लेकिन सरकार को यह बताना चाहिए—
निविदा प्रक्रिया में कौन-कौन कंपनियां शामिल हुईं?
किस कंपनी को कितने अंकों के आधार पर तकनीकी पात्रता मिली?
वित्तीय बोली का पूरा तुलनात्मक विवरण क्या है?
विजेता कंपनी की पिछली परियोजनाओं का प्रदर्शन क्या रहा?
उसके खिलाफ कोई सरकारी जांच, दंड, गुणवत्ता कार्रवाई या मुकदमा लंबित है?
कंपनी और उसके प्रवर्तकों ने पिछले पांच वर्षों में किन राजनीतिक दलों को कितना चंदा दिया?
निविदा से पहले और बाद में कंपनी के स्वामित्व अथवा सहयोगी कंपनियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव हुआ या नहीं?
परियोजना की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच कौन करेगा?
सड़क टूटने की स्थिति में जिम्मेदारी किस अधिकारी और किस ठेकेदार की होगी?
क्या खराब सड़क के लिए भुगतान रोकने की वास्तविक व्यवस्था है?
कर्ज जनता का, जोखिम जनता का, मुनाफा किसका?
यही पूरी कहानी का सबसे बड़ा व्यंग्य है।
सरकार कर्ज लेती है।
जनता कर देती है।
सरकार ठेका देती है।
ठेकेदार सड़क बनाता है।
उद्घाटन नेता करते हैं।
फोटो अखबार में आती है।
कुछ साल बाद सड़क खराब होती है।
सरकार फिर पैसा लगाती है।
और जनता?
वह फिर उसी सड़क पर गड्ढा बचाकर चलती है।
अगर यही विकास मॉडल है तो जनता पूछ सकती है—
सड़क बनाने का ठेका किसे मिला, यह जानने से ज्यादा जरूरी यह क्यों नहीं कि सड़क कितने साल टिकेगी?
सीएजी की रिपोर्ट को नजरअंदाज क्यों?
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