सीएजी की ताजा सड़क ऑडिट रिपोर्ट में नई बनी सड़कों के खराब होने, निर्माण गुणवत्ता और परियोजना क्रियान्वयन से जुड़े सवाल दर्ज हैं।

तो 88,634 करोड़ रुपये की नई सड़क योजना शुरू करने से पहले सरकार को पुरानी परियोजनाओं की जिला-वार गुणवत्ता समीक्षा करनी चाहिए।

हर सड़क का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए—

किसने बनाई?


कितने में बनाई?


कब पूरी हुई?


गारंटी कितने वर्ष की थी?


कितनी बार मरम्मत हुई?


मरम्मत पर कितना खर्च हुआ?


ठेकेदार पर क्या कार्रवाई हुई?


जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे, तब तक नई परियोजनाओं की चमक के पीछे पुरानी सड़कों की दरारें दिखाई देती रहेंगी।



सरकार से “बौद्धिक प्रतिकार” के 10 सीधे सवाल


1. 88,634 करोड़ रुपये की पूरी योजना में प्रत्येक परियोजना का वित्तीय स्रोत क्या होगा?


2. कितनी परियोजनाएं राज्य के कर्ज से और कितनी केंद्रीय सहायता से बनेंगी?


3. क्या प्रत्येक ठेकेदार का पिछले दस वर्षों का गुणवत्ता रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाएगा?


4. क्या राजनीतिक चंदा देने वाली कंपनियों की सरकारी निविदाओं में भागीदारी का पूरा खुलासा किया जाएगा?


5. क्या किसी ठेकेदार पर भ्रष्टाचार संबंधी प्राथमिकी या विभागीय कार्रवाई लंबित होने पर उसे नई निविदा में पात्र माना जाएगा?


6. क्या सड़क निर्माण की स्वतंत्र तृतीय-पक्ष गुणवत्ता जांच अनिवार्य होगी?


7. सड़क निर्धारित समय से पहले खराब होने पर ठेकेदार के भुगतान और सुरक्षा राशि पर क्या कार्रवाई होगी?


8. क्या अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी या हर बार सिर्फ ठेकेदार को दोषी बताया जाएगा?


9. क्या सरकार पांच साल में बनने वाली 29,682 किलोमीटर सड़कों का जिला-वार सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाएगी?


10. और सबसे बड़ा सवाल—क्या मध्यप्रदेश को सचमुच नई सड़कें चाहिएं या पहले पुरानी सड़कों को टिकाऊ बनाने की जरूरत है?



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निष्कर्ष


मध्यप्रदेश में सड़क निर्माण रोकने की जरूरत नहीं है।


भ्रष्टाचार रोकने की जरूरत है।


ठेके रोकने की जरूरत नहीं है।


ठेकेदारी में पारदर्शिता लाने की जरूरत है।


बड़े ठेकेदारों को काम देने में कोई बुराई नहीं।


लेकिन बड़े ठेकेदारों के लिए बड़ी जवाबदेही भी होनी चाहिए।


राजनीतिक दलों को चंदा देना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जब वही कारोबारी समूह सार्वजनिक परियोजनाओं में हजारों करोड़ रुपये की निविदाओं में उतरते हैं, तो जनता का यह जानना बिल्कुल जायज है कि राजनीतिक चंदा और सरकारी ठेका पूरी तरह अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं या कहीं कोई ऐसा रिश्ता है जिसे जनता से छिपाया जा रहा है।


अभी उपलब्ध दस्तावेज किसी मुख्यमंत्री या सरकार को ठेकेदारों से रिश्वत लेने का प्रमाण नहीं देते।


लेकिन दस्तावेज यह जरूर बताते हैं कि—


हजारों करोड़ की सड़क परियोजनाएं हैं, बड़े-बड़े ठेकेदार हैं, राजनीतिक चंदे का सार्वजनिक रिकॉर्ड है, गुणवत्ता पर सीएजी की आपत्तियां हैं और राज्य पर बढ़ता कर्ज है।


अब गेंद सरकार के पाले में है।


मोहन सरकार बताए—88,634 करोड़ की सड़क यात्रा में जनता का पैसा सड़क पर जाएगा या व्यवस्था की दरारों में?


नोट: इस पड़ताल में “राजनीतिक चंदा” और “सरकारी ठेका” को रिश्वत या लेन-देन के रूप में नहीं जोड़ा गया है। जहां किसी कंपनी के खिलाफ जांच, प्राथमिकी, कार्रवाई या गुणवत्ता संबंधी आरोप हैं, उन्हें उसी कानूनी स्थिति में प्रस्तुत किया गया है। इससे खबर तीखी भी रहती है और मानहानि के जोखिम से भी बचती है।

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