इलाज की जरूरत पड़ते ही आम आदमी के सामने बीमारी के साथ एक और बड़ा संकट खड़ा हो रहा है—इलाज का खर्च। नेशनल सैंपल सर्वे के 80वें दौर के आंकड़ों के आधार पर लोकलसर्किल्स की रिपोर्ट में सरकारी और निजी अस्पतालों के खर्च में बड़ा अंतर सामने आया है।
आंकड़ों के मुताबिक, सरकारी अस्पताल में इलाज पर औसतन 6,631 रुपये खर्च हो रहे हैं, जबकि निजी अस्पताल में यही खर्च बढ़कर 50,508 रुपये तक पहुंच रहा है। यानी निजी अस्पताल में इलाज का औसत खर्च सरकारी अस्पताल की तुलना में करीब 7.6 गुना, यानी लगभग आठ गुना अधिक है।
यह अंतर केवल आंकड़ा नहीं है। एक सामान्य परिवार के लिए 6,631 रुपये और 50,508 रुपये के बीच का फर्क उसकी कई महीनों की बचत पर भारी पड़ सकता है। गंभीर बीमारी, ऑपरेशन या लंबे इलाज की स्थिति में निजी अस्पताल का खर्च और तेजी से बढ़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब निजी इलाज इतना महंगा है तो आम परिवार आखिर जाए कहां? सरकारी अस्पतालों पर मरीजों का दबाव लगातार बढ़ता है, जबकि निजी अस्पतालों में बेहतर सुविधाओं और जल्दी इलाज की उम्मीद के साथ पहुंचने वाले मरीजों को भारी बिल का सामना करना पड़ता है।
स्वास्थ्य बीमा की पहुंच बढ़ने के बावजूद बड़ी आबादी के लिए हर चिकित्सा खर्च बीमा से पूरा होना संभव नहीं है। ऐसे में बीमारी परिवार की आर्थिक स्थिति को भी हिला देती है।
इलाज जीवन बचाने के लिए है, लेकिन अगर उसका खर्च ही परिवार की कमर तोड़ दे तो स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

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