आरडीएसएस का मूल उद्देश्य वितरण व्यवस्था को मजबूत करना, बिजली हानियां कम करना और उपभोक्ताओं को बेहतर आपूर्ति उपलब्ध कराना है। केंद्र सरकार ने भी इसे सुधार आधारित और परिणाम से जुड़ी योजना के रूप में शुरू किया था।
लेकिन मध्य प्रदेश में यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी पोल झुक रहे हैं, अर्थिंग अधूरी है और सुरक्षा उपकरण गायब हैं, तो परिणाम आधारित योजना का मूल्यांकन जमीन पर क्यों नहीं किया जा रहा?
मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने पहले आरडीएसएस के तहत 16 जिलों में बड़े पैमाने पर कामों की जानकारी दी थी। उस समय कंपनी के प्रबंध संचालक गणेश शंकर मिश्रा ने योजना के कार्यों की जानकारी दी थी।
बाद में कंपनी के प्रबंध संचालक के रूप में क्षितिज सिंघल का नाम आधिकारिक/कंपनी संबंधी स्रोतों और सार्वजनिक रिपोर्टों में सामने आता है। कंपनी ने 2025 में भी कार्यों में पारदर्शिता और लापरवाही के खिलाफ शून्य-सहनशीलता की बात कही थी।
प्रदेश के ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर हैं और विधानसभा के हालिया रिकॉर्ड में भी बिजली वितरण कंपनियों तथा आरडीएसएस से जुड़े विषयों पर उनके जवाब दर्ज हैं।
अब मंत्री और कंपनी से पांच सीधे सवाल
1. 3310 करोड़ की योजना में 1710 करोड़ खर्च होने के बाद कितने काम वास्तविक रूप से पूर्ण हैं?
2. हरदा, बैतूल, गुना, राजगढ़ और रायसेन में मिली तकनीकी खामियों के लिए जिम्मेदार ठेकेदारों के नाम क्या हैं?
3. इन कार्यों की गुणवत्ता जांच और भुगतान प्रमाणित करने वाले अभियंताओं के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?
4. डिस्मेंटल सामग्री भोपाल में जमा नहीं होने पर उसका हिसाब किसके पास है?
5. यदि निरीक्षण में काम अधूरा या मानकविहीन मिला है तो क्या संबंधित ठेकेदारों से भुगतान की वसूली, सुरक्षा जमा जब्ती और दंडात्मक कार्रवाई होगी?
बिजली बिल बढ़े, लेकिन ढांचा वही पुराना?
उपभोक्ता लगातार बिजली के बढ़ते खर्च की शिकायत कर रहे हैं। दूसरी ओर सरकार वितरण व्यवस्था सुधारने के नाम पर बड़ी राशि खर्च कर रही है।
ऐसे में जनता का सवाल बेहद सीधा है—
अगर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी पोल टेढ़े हैं, अर्थिंग अधूरी है और सुरक्षा उपकरण गायब हैं, तो बिजली सुधार आखिर हुआ कहां?
आरडीएसएस को केवल निर्माण और भुगतान की योजना नहीं, बल्कि परिणाम की योजना बनाना होगा।
और यदि निरीक्षण में मिली खामियां सही हैं तो अब केवल दोष सुधारने के निर्देश पर्याप्त नहीं होंगे।
ठेकेदार से लेकर निगरानी करने वाले अधिकारी तक—जिम्मेदारी तय करनी होगी।
क्योंकि पैसा सरकारी खजाने का है, लेकिन उसकी भरपाई आखिरकार बिजली उपभोक्ता ही करता है।
बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल का अगला सवाल:
आरडीएसएस के इन पांच जिलों में काम पाने वाले ठेकेदार कौन हैं, उन्हें कितने कार्यादेश मिले और अब तक उन्हें कितना भुगतान किया गया? यही अगली कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी पड़ताल होनी चाहिए।

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