कर्ज का बोझ, मोहन सरकार से जनता का सवाल—3,600 करोड़ और कितनी उधारी?

 

2056 तक चुकाना होगा कर्ज, ब्याज का बोझ भी जनता पर; मुख्यमंत्री मोहन यादव बताएं—कर्ज का पूरा हिसाब कहां है?

— प्रणव बजाज


प्रमुख संपादक, बौद्धिक प्रतिकार


भोपाल। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार ने एक बार फिर 3,600 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया है। पहली किश्त 1,600 करोड़ रुपये की है, जिसे 18 वर्ष में चुकाया जाएगा, जबकि दूसरी किश्त 2,000 करोड़ रुपये की है और इसकी अदायगी वर्ष 2056 तक होगी।



सरकार का कहना है कि यह धन विकास कार्यों में लगाया जाएगा। लेकिन मेरा सवाल मुख्यमंत्री मोहन यादव से है—जब कर्ज जनता के नाम पर लिया जा रहा है तो उसका पूरा हिसाब भी जनता के सामने क्यों नहीं होना चाहिए?


मध्य प्रदेश पर पहले से ही भारी कर्ज है। हालिया कैग रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024-25 में सरकार के कुल उधार का 29.43 प्रतिशत हिस्सा पुराने कर्ज की अदायगी में गया। इसी अवधि में केवल ब्याज भुगतान पर 21,466 करोड़ रुपये खर्च हुए।


यह आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं। इनके पीछे प्रदेश के करोड़ों नागरिकों का पैसा और आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी जुड़ी है।


मोहन यादव सरकार से सीधे सवाल


मुख्यमंत्री जी, जनता जानना चाहती है—


3,600 करोड़ रुपये किन-किन योजनाओं में खर्च होंगे?


हर परियोजना पर कितनी राशि खर्च होगी?


किस विभाग और किस क्षेत्र को कितना पैसा मिलेगा?


इन परियोजनाओं से आम जनता को सीधा क्या लाभ मिलेगा?


और सबसे महत्वपूर्ण—


क्या सरकार इन 3,600 करोड़ रुपये के एक-एक रुपये का सार्वजनिक हिसाब देगी?


मेरा यह सवाल किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह मेरा अपना स्पष्ट मत है और जनता के हित में है।


मैं विकास का विरोधी नहीं हूं। सड़क चाहिए, अस्पताल चाहिए, स्कूल चाहिए, रोजगार चाहिए, सिंचाई चाहिए और बुनियादी सुविधाएं चाहिए। लेकिन विकास के नाम पर लिया गया पैसा वास्तव में विकास में ही लगे—यह सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है।


कर्ज सरकार लेती है, चुकाती जनता है


सरकार जब कर्ज लेती है तो धन सरकारी खजाने में आता है, लेकिन उसकी मूल राशि और ब्याज अंततः सार्वजनिक संसाधनों से ही चुकाया जाता है।


इसलिए मेरा मानना है कि जनता को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं है कि सरकार ने कितना कर्ज लिया। जनता को यह भी बताया जाना चाहिए कि कर्ज का पैसा कहां गया।


यदि कोई परियोजना जनता के लिए है तो उसका पूरा विवरण सार्वजनिक करने में सरकार को संकोच क्यों होना चाहिए?


नेता, अधिकारी या ठेकेदार नहीं—पहला अधिकार जनता का


मेरा आरोप किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं है। लेकिन एक पत्रकार और संपादक के रूप में मेरा सवाल साफ है—सरकारी योजनाओं का पहला लाभ जनता को मिलना चाहिए।


यदि किसी योजना में जनता का पैसा खर्च हो रहा है, तो उसकी निगरानी भी जनता के हित में होनी चाहिए।


हम यह नहीं कह रहे कि सरकार कर्ज न ले। हमारा सवाल है कि कर्ज लेकर प्रदेश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है या आने वाली पीढ़ियों पर बोझ बढ़ रहा है?


मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार को इस सवाल का जवाब आंकड़ों के साथ देना चाहिए।


यह लड़ाई सत्ता से नहीं, सवालों से है


मैं स्पष्ट करना चाहता हूं—यह मेरा व्यक्तिगत संपादकीय मत है।


हम किसी सरकार के विरोध के लिए नहीं लिखते। हम जनता के पक्ष में लिखते हैं।


सरकार किसी भी दल की हो, मुख्यमंत्री कोई भी हो, यदि जनता के पैसे का सवाल होगा तो हम सवाल पूछेंगे।


जनता के लिए हम किसी भी सीमा तक आवाज उठाएंगे।


क्योंकि सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन कर्ज का बोझ जनता और आने वाली पीढ़ियां चुकाती हैं।


मोहन यादव जी, कर्ज लीजिए—लेकिन जनता को हिसाब भी दीजिए।


जनता का पैसा है।

जनता को जवाब चाहिए।

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