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गरीबों के इलाज की मदद में बड़ा सवाल: 741 करोड़ रुपये जारी, अब फर्जी आवेदनों की पड़ताल*

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मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान में फर्जीवाड़े के आरोपों ने खोली व्यवस्था की कमजोरियां;


प्रणव बजाज

भोपाल। मध्य प्रदेश में गरीब मरीजों के इलाज के लिए दी जाने वाली मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान राशि को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 7 अगस्त 2026 को प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार भोपाल और सीहोर के 10 से अधिक अस्पतालों में ऐसे मामलों की जांच की जा रही है, जिनमें बिना बीमारी या बिना भर्ती हुए मरीजों के नाम पर सहायता राशि लेने का संदेह सामने आया है। 



मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023-24 से 16 जुलाई 2026 तक 2,06,511 आवेदन प्राप्त हुए और 1,22,106 आवेदन स्वीकृत हुए। इन पर कुल 741.14 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। 


सबसे बड़ा सुराग—एक ही मोबाइल नंबर, कई मरीज


जांच में 18 मोबाइल नंबर ऐसे मिले, जिनका इस्तेमाल अलग-अलग मरीजों के नाम से आवेदन करने में हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ नंबरों से 17 से 18 बार तक अलग-अलग नामों पर आवेदन किए गए।


यहीं से जांच का सबसे महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है—


क्या ये केवल अलग-अलग आवेदकों की तकनीकी गलती थी या किसी संगठित तरीके से फर्जी मरीज और फर्जी उपचार के मामले तैयार किए जा रहे थे?


अभी इसका अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा। लेकिन एक ही नंबर का बार-बार अलग-अलग मरीजों के आवेदन में इस्तेमाल होना निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल जरूर खड़ा करता है। 


741 करोड़ का हिसाब: रकम छोटी नहीं है


उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सहायता राशि का वर्षवार विवरण इस प्रकार है—

वर्ष

जारी राशि

2023-24

₹191.80 करोड़

2024-25

₹197.25 करोड़

2025-26

₹299.40 करोड़

2026-27, 16 जुलाई तक

₹52.69 करोड़

कुल

₹741.14 करोड़

यानी चार अवधियों में औसतन हर स्वीकृत आवेदन पर करीब 60 हजार रुपये की सहायता बैठती है।


सवाल यह है कि इतनी बड़ी राशि जारी होने के बावजूद फर्जी आवेदन पकड़ने के लिए मजबूत पूर्व-जांच व्यवस्था पहले क्यों नहीं थी?


बजट बढ़ा, निगरानी कब बढ़ी?


रिपोर्ट के अनुसार स्वेच्छानुदान का बजट 200 करोड़ से बढ़ाकर 300 करोड़ रुपये किया गया। इसके बाद आवेदन प्रक्रिया को आयुष्मान भारत, समग्र पहचान और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से जोड़ने की दिशा में कदम उठाए गए।


लेकिन डेटा मिलान के दौरान एक ही मोबाइल नंबर से बार-बार आवेदन सामने आने के बाद जांच शुरू हुई। 


यहां शासन के सामने सबसे बड़ा प्रश्न है—


जब आवेदन, मरीज, अस्पताल, पहचान और मोबाइल नंबर का आंकड़ा उपलब्ध था, तो बार-बार होने वाले संदिग्ध आवेदनों की पहचान पहले क्यों नहीं हो सकी?



मकसूदनगढ़ का मामला जांच की गंभीरता बताता है


रिपोर्ट में मकसूदनगढ़ के एक अस्पताल का उदाहरण दिया गया है। आरोप है कि एक मरीज को अस्पताल में भर्ती दिखाकर सहायता के लिए आवेदन किया गया, जबकि जांच में उसके भर्ती होने की पुष्टि नहीं हुई।


एक अन्य मामले में नर्सिंग होम पर मरीज को केवल नली लगाकर बिस्तर पर लिटाने और उसका चित्र भेजने का आरोप सामने आया।


यदि जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं तो मामला केवल गलत आवेदन का नहीं रहेगा, बल्कि मरीज, अस्पताल, दस्तावेज और सरकारी भुगतान की पूरी श्रृंखला की जांच जरूरी होगी। 




सरकारी दस्तावेज से भी उठता है एक बड़ा सवाल


मध्य प्रदेश की आधिकारिक जनसुनवाई व्यवस्था में उपलब्ध एक मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय के हवाले से स्पष्ट दर्ज है कि मुख्यमंत्री सहायता कोष और मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान को नियमित योजना या कार्यक्रम नहीं माना गया था तथा सहायता मुख्यमंत्री कार्यालय की इच्छा के अनुसार स्वीकृत और वितरित होती है। 


यही तथ्य इस पूरे मामले को और महत्वपूर्ण बनाता है।


जब हजारों गरीब मरीजों को सैकड़ों करोड़ रुपये की सहायता दी जा रही है, तब सवाल केवल फर्जी आवेदन का नहीं है।


सवाल यह भी है कि इस राशि के आवंटन, स्वीकृति, अस्पताल के सत्यापन और भुगतान की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है?




नए नियमों से क्या रुकेगा फर्जीवाड़ा?


रिपोर्ट के अनुसार अब आवेदन के साथ—



चिकित्सकीय अनुमान


चिकित्सकीय अभिलेख


आधार


समग्र पहचान


जनप्रतिनिधि की अनुशंसा




जैसी जानकारी अनिवार्य किए जाने की व्यवस्था की जा रही है। आवेदन निरस्त होने पर मरीज, अस्पताल और संबंधित जनप्रतिनिधि को सूचना देने की व्यवस्था भी बताई गई है। 


लेकिन असली परीक्षा नियम बनाने की नहीं, उनके पालन की है।


यदि अस्पताल द्वारा गलत चिकित्सकीय अभिलेख तैयार किए जाते हैं, तो केवल पोर्टल को दूसरे सरकारी आंकड़ों से जोड़ने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।




बौद्धिक प्रतिकार की पड़ताल के लिए पांच सीधे सवाल


1. 741.14 करोड़ रुपये में से कितने भुगतान की स्वतंत्र जांच हुई?


2. 18 संदिग्ध मोबाइल नंबरों से जुड़े सभी आवेदनों में कुल कितनी राशि जारी हुई?


3. जिन अस्पतालों पर संदेह है, उनके नाम जांच पूरी होने के बाद सार्वजनिक किए जाएंगे या नहीं?


4. क्या पिछले चार वर्षों के सभी स्वीकृत मामलों का अस्पतालवार और जिलावार लेखा परीक्षण कराया जाएगा?


5. यदि फर्जी मरीज या फर्जी उपचार साबित होता है तो केवल अस्पताल नहीं, बल्कि आवेदन स्वीकृत करने वाले अधिकारियों और सत्यापन करने वाली पूरी श्रृंखला की जिम्मेदारी तय होगी या नहीं?


सबसे बड़ा सवाल: गरीब का पैसा किसके लिए?


मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान का उद्देश्य उन गरीब परिवारों को उपचार के लिए आर्थिक सहायता देना है, जो महंगे इलाज का खर्च नहीं उठा सकते। इसलिए इसमें होने वाली कथित गड़बड़ी को सामान्य वित्तीय अनियमितता मानकर छोड़ना गरीब मरीजों के साथ अन्याय होगा।


741 करोड़ रुपये की सहायता केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह लाखों जरूरतमंद परिवारों की उम्मीद से जुड़ी सार्वजनिक धनराशि है।


इसलिए जांच का दायरा केवल कुछ अस्पतालों और मोबाइल नंबरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आवेदन से भुगतान तक पूरी श्रृंखला का स्वतंत्र लेखा परीक्षण होना चाहिए और जहां फर्जीवाड़ा प्रमाणित हो, वहां राशि की वसूली के साथ जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।


नोट: इस रिपोर्ट में अस्पतालों और संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध लगे आरोपों को जांचाधीन तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अंतिम दोष सिद्धि सक्षम जांच या न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्ष पर निर्भर होगी।

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