नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध अर्पित किए जाने के मामले पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अधिकरण ने कहा कि धार्मिक आस्था और पूजा-पद्धति पर रोक लगाने का कोई कानून नहीं है, लेकिन बड़ी मात्रा में दूध या अन्य सामग्री नदी में प्रवाहित करना पर्यावरण की दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।
एनजीटी ने स्पष्ट किया कि नदियों को प्रदूषण से बचाना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। धार्मिक आयोजनों के दौरान यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आस्था के नाम पर जल स्रोतों को नुकसान न पहुंचे और पर्यावरणीय संतुलन बना रहे।
मामले की सुनवाई के दौरान अधिकरण ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिए कि भविष्य में ऐसे आयोजनों पर निगरानी रखी जाए और आवश्यकता पड़ने पर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित कराया जाए।
एनजीटी ने यह भी कहा कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन उनके आयोजन ऐसे तरीके से हों जिससे नदियों की स्वच्छता और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक आस्था के बीच संतुलन बनाए रखना समय की आवश्यकता है।

Post a Comment