भोपाल, इंदौर और ग्वालियर जैसे बड़े शहरों में जमीन के उपयोग का गणित उलझा, अनियोजित विकास को मिल रहा बढ़ावा
भोपाल। मध्य प्रदेश के बड़े शहरों का नियोजित विकास अब भी मास्टर प्लान की प्रतीक्षा में अटका हुआ है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे प्रमुख शहरों में मास्टर प्लान लागू नहीं होने से जमीन के उपयोग को लेकर असमंजस बना हुआ है।
शहरों में कहां आवासीय क्षेत्र होगा, कहां व्यावसायिक गतिविधियां होंगी, कहां औद्योगिक क्षेत्र विकसित होंगे और कौन से हिस्से हरित क्षेत्र के रूप में सुरक्षित रहेंगे, यह स्पष्ट रूप से तय नहीं हो पा रहा है। इसका सीधा असर शहरों के सुनियोजित विस्तार पर पड़ रहा है।
भूमि विकास नियमों का नया मसौदा तैयार किया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मास्टर प्लान लागू नहीं होगा, तब तक भूमि उपयोग की तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हो सकती।
मध्य प्रदेश के कई बड़े शहरों के मास्टर प्लान की अवधि कई वर्ष पहले समाप्त हो चुकी है, लेकिन नए मास्टर प्लान अब तक लागू नहीं हो पाए हैं। इस देरी के कारण शहरों के बाहरी क्षेत्रों में अनियंत्रित कॉलोनियां, बढ़ता यातायात दबाव और मूलभूत सुविधाओं पर अतिरिक्त बोझ जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
सरकार ने बड़े शहरों के बेहतर नियोजन के लिए मेट्रोपॉलिटन रीजन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का सवाल है कि जब तक जमीन के उपयोग का स्पष्ट खाका तैयार नहीं होगा, तब तक विकास योजनाओं को गति कैसे मिलेगी?
सबसे बड़े सवाल
- बड़े शहरों के मास्टर प्लान में देरी क्यों हो रही है?
- भूमि उपयोग तय किए बिना विकास कार्य किस आधार पर हो रहे हैं?
- क्या बढ़ते शहरी विस्तार के लिए भविष्य की जरूरतों का आकलन किया गया है?
- क्या मास्टर प्लान में देरी से अवैध और अनियोजित निर्माण को बढ़ावा मिल रहा है?
मध्य प्रदेश के तेजी से बढ़ते शहरों के लिए मास्टर प्लान अब केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि आने वाले दशकों के विकास की आधारभूत जरूरत बन चुका है।

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