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डायमंड गृह निर्माण संस्था की जमीन पर सहकारिता विभाग की 'जादूगरी' शुरू? सेठिया और कूचनकर की भूमिका पर उठे सवाल

 

प्रणवबजाज

इंदौर। खजराना क्षेत्र स्थित डायमंड गृह निर्माण संस्था की लगभग 500 करोड़ रुपये मूल्य की बहुचर्चित जमीन का मामला अब केवल पुलिस जांच तक सीमित नहीं रहा। सहकारिता विभाग भी सक्रिय हुआ है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या विभाग वास्तव में सच सामने लाना चाहता है या फिर पुराने दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रियाओं की आड़ में पूरे मामले को नया मोड़ देने की तैयारी है। 


सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि डायमंड गृह निर्माण संस्था का पंजीयन आज तक निरस्त नहीं हुआ और संस्था का विधिवत परिसमापन भी पूरा नहीं हुआ, तो संस्था की संपत्ति का हस्तांतरण किन अधिकारों के आधार पर हुआ? यही प्रश्न अब पूरे मामले का केंद्र बन गया है। 

सहकारिता विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि संस्था आज भी अभिलेखों में जीवित है और उसके लिए प्रशासक नियुक्त है। वर्तमान में सहकारिता निरीक्षक संजय कूचनकर प्रशासक बताए जा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि संस्था अस्तित्व में थी तो वर्षों तक उसकी संपत्तियों, अभिलेखों और सदस्य हितों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए? 

सूत्रों के अनुसार, अब विभाग की ओर से पुराने दस्तावेज, रजिस्ट्रियां, नोटरियां और फर्म से जुड़े अभिलेख मंगाए जा रहे हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह कार्रवाई तब शुरू हुई, जब पुलिस और प्रशासन ने पूरे प्रकरण में सख्ती दिखाई। यदि पहले ही रिकॉर्ड की समीक्षा होती, तो विवाद इतना बड़ा नहीं बनता। 

मामले में संघवी (सेठिया/संघवी समूह से जुड़े नामों का भी उल्लेख विभिन्न रिपोर्टों में) और अन्य संबंधित पक्षों के दस्तावेजों की जांच की बात सामने आई है। पुलिस पहले ही कुछ आरोपियों से पूछताछ कर चुकी है और जमीन के स्वामित्व, विकास अनुबंध तथा कब्जे को लेकर कई पहलुओं की जांच कर रही है। 

इस पूरे प्रकरण का एक और गंभीर पहलू यह भी है कि वर्ष 2003 में हुए जमीन सौदे, स्टाम्प ड्यूटी में कथित अनियमितताओं तथा बाद की खरीद-फरोख्त को लेकर पहले भी विवाद और शिकायतें सामने आती रही हैं। इन मामलों में लोकायुक्त तक शिकायत पहुंचने की जानकारी भी सार्वजनिक रिपोर्टों में दर्ज है। 

उठ रहे बड़े सवाल

यदि संस्था का परिसमापन पूरा नहीं हुआ था, तो जमीन बेचने का अधिकार किसके पास था?

प्रशासक की मौजूदगी में वर्षों तक रिकॉर्ड की निगरानी क्यों नहीं हुई?

सहकारिता विभाग अब सक्रिय क्यों हुआ?

क्या जांच केवल औपचारिकता है या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी?

संस्था के वास्तविक सदस्यों और भूखंडधारकों के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा?

अब निगाहें इस बात पर हैं कि सहकारिता विभाग केवल नोटिस जारी कर औपचारिकता निभाता है या फिर पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों, पूर्व पदाधिकारियों और लाभार्थियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक दोषियों तक पहुंचता है। फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर जांच जारी है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है।

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