भोपाल/इंदौर।
प्रणव बजाज
मध्यप्रदेश में अवैध शराब का चेहरा बदल चुका है। कभी यह समस्या केवल कच्ची शराब तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन अब प्रदेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती अंतरराज्यीय विदेशी शराब तस्करी बनकर उभरी है। हाल ही में भोपाल और इंदौर में आबकारी विभाग की बड़ी कार्रवाइयों ने इस संगठित नेटवर्क की कई परतें खोल दी हैं। सवाल यह है कि क्या यह केवल दो शहरों तक सीमित है, या पूरा प्रदेश ऐसे नेटवर्क की गिरफ्त में है?
भोपाल का खुलासा: व्हाट्सएप पर ऑर्डर, घर-घर शराब की डिलीवरी
भोपाल में आबकारी विभाग ने ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया जो व्हाट्सएप के जरिए ऑर्डर लेकर घर तक शराब पहुंचा रहा था। जांच में सामने आया कि शराब उत्तर प्रदेश की सीमा से मध्यप्रदेश लाई जा रही थी। कार्रवाई में अन्य राज्यों की विदेशी शराब, सेना कैंटीन की शराब और बिना लेबल वाली शराब भी बरामद हुई। यह केवल कर चोरी का मामला नहीं बल्कि उपभोक्ताओं की जान से खिलवाड़ का भी संकेत है।
इंदौर की कार्रवाई ने भी खोली पोल
कुछ समय पहले इंदौर में करोड़ों रुपये के अवैध शराब कारोबार का भंडाफोड़ हुआ। नकली ब्रांड, फर्जी लेबल और अवैध पैकिंग के जरिए बाजार में शराब उतारी जा रही थी। इससे स्पष्ट है कि तस्करी अब संगठित उद्योग का रूप ले चुकी है।
सबसे बड़ा सवाल: आखिर इतनी शराब सीमा पार कैसे पहुंच रही है?
यदि प्रतिदिन हजारों पेटियां दूसरे राज्यों से मध्यप्रदेश पहुंच रही हैं तो सवाल केवल तस्करों पर नहीं, बल्कि पूरी निगरानी व्यवस्था पर भी उठते हैं।
क्या सीमावर्ती जिलों में जांच पर्याप्त है?
क्या बसों, ट्रकों और निजी वाहनों की प्रभावी निगरानी हो रही है?
क्या ऑनलाइन ऑर्डर और सोशल मीडिया नेटवर्क पर नजर रखी जा रही है?
क्या पूरे नेटवर्क के मास्टरमाइंड तक कार्रवाई पहुंच रही है या केवल सप्लायर पकड़े जा रहे हैं?
सरकार को दोहरा नुकसान
अंतरराज्यीय शराब तस्करी का सबसे बड़ा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है।
आबकारी शुल्क की चोरी।
वैध लाइसेंसी दुकानों की बिक्री में गिरावट।
महंगे ठेके लेने वाले कारोबारियों पर आर्थिक दबाव।
कई क्षेत्रों में ठेकों के संचालन पर संकट
जब सरकार हर वर्ष शराब ठेकों की कीमत बढ़ा रही है, लेकिन अवैध शराब समानांतर बाजार बना रही है, तब वैध कारोबारियों की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है।
क्या जनता भी जिम्मेदार है?
सिर्फ प्रशासन को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा।
जब उपभोक्ता बाजार से 30-40 प्रतिशत सस्ती शराब खरीदता है, तब उसे यह भी सोचना चाहिए—
इतनी सस्ती शराब आई कहां से?
क्या उस पर कर चुकाया गया?
क्या गुणवत्ता की जांच हुई?
कहीं वह नकली या मिलावटी तो नहीं?
कुछ रुपये बचाने की कोशिश कई बार जानलेवा साबित हो सकती है।
क्या होना चाहिए?
पूरे प्रदेश में विशेष अभियान।
सभी सीमावर्ती जिलों में संयुक्त चेकिंग।
रेलवे, बस स्टैंड और निजी ट्रांसपोर्ट पर निगरानी।
व्हाट्सएप और सोशल मीडिया आधारित सप्लाई नेटवर्क पर साइबर कार्रवाई।
बार-बार पकड़े जाने वाले गिरोहों पर गैंगस्टर और संगठित अपराध कानून के तहत कार्रवाई।
शराब की प्रत्येक खेप की डिजिटल ट्रैकिंग व्यवस्था।
बौद्धिक प्रतिकार का सवाल
भोपाल और इंदौर में कार्रवाई हुई, लेकिन क्या यह पूरे नेटवर्क का अंत है या केवल एक छोटी कड़ी?
यदि शराब का समानांतर बाजार इसी तरह चलता रहा तो नुकसान केवल सरकारी राजस्व का नहीं होगा, बल्कि वैध व्यापार, उपभोक्ताओं की सुरक्षा और कानून व्यवस्था—तीनों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
सवाल सरकार से भी है और समाज से भी।
क्या मध्यप्रदेश अंतरराज्यीय शराब तस्करी के खिलाफ राज्यव्यापी अभियान चलाएगा, या कार्रवाई केवल छापों तक सीमित रहेगी?

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