विशेष संवाददाता | जबलपुर
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उम्रकैद की सजा काट रहे आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हुआ। मामले में प्रस्तुत रेडियोलॉजिस्ट की आयु निर्धारण रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने पाया कि निचली अदालत का निर्णय टिक नहीं सकता।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी भी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर ही की जा सकती है। यदि चिकित्सा साक्ष्य, दस्तावेजी प्रमाण और गवाहों के बयान अभियोजन की कहानी से मेल नहीं खाते, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना न्याय का मूल सिद्धांत है।
मामले में विवाद का प्रमुख बिंदु पीड़िता की उम्र था। अदालत ने रेडियोलॉजिस्ट की रिपोर्ट को महत्वपूर्ण साक्ष्य मानते हुए कहा कि उपलब्ध प्रमाणों से अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि घटना के समय पीड़िता की आयु अभियोजन के दावे के अनुरूप थी। ऐसे में कठोर दंड को बरकरार रखना उचित नहीं होगा।
इस फैसले के बाद यह बहस भी तेज हो गई है कि दुष्कर्म और पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में आयु निर्धारण, मेडिकल जांच और वैज्ञानिक साक्ष्यों की गुणवत्ता अत्यंत महत्वपूर्ण है। जांच में छोटी-सी त्रुटि भी पूरे मुकदमे की दिशा बदल सकती है।
न्यायालय का संदेश
हाई कोर्ट का यह निर्णय दुष्कर्म जैसे अपराधों की गंभीरता को कम नहीं करता, बल्कि यह सिद्धांत दोहराता है कि दोषसिद्धि केवल संदेह से परे प्रमाणों के आधार पर ही हो सकती है। न्याय व्यवस्था का उद्देश्य अपराधी को दंड देना है, लेकिन किसी निर्दोष को दंडित होने से बचाना भी उतना ही आवश्यक है। इसलिए निष्पक्ष जांच, सटीक मेडिकल परीक्षण और मजबूत साक्ष्य ही न्याय की सबसे बड़ी आधारशिला हैं।

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