देश की राजनीति में मौसम बदलते रहते हैं। कभी जाति का मौसम, कभी आरक्षण का, कभी राष्ट्रवाद का और अब फिर से सनातन का मौसम लौट आया है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार हर दल का नेता खुद को सबसे बड़ा सनातनी साबित करने में जुटा है।
कुछ दिन पहले तक जो नेता महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बयान देते थे, अब उनके भाषणों में राम, सनातन और मंदिरों की गूंज सुनाई दे रही है। आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने खुद को "सच्चा सनातनी" बताते हुए भाजपा पर भगवान राम के नाम पर राजनीति करने का आरोप लगाया।
इसके जवाब में भाजपा ने भी पूरा मोर्चा खोल दिया। दिल्ली सरकार के मंत्री प्रवेश वर्मा ने तंज कसते हुए पूछा— "मैं याद हूँ कि नहीं?" वहीं भाजपा के अन्य नेताओं ने भी केजरीवाल के पुराने बयानों और मौजूदा रुख पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। पूरे घटनाक्रम में ऐसा लगने लगा कि अब चुनाव जीतने के लिए विकास का नहीं, "सनातनी सर्टिफिकेट" का महत्व ज्यादा हो गया है।
हैरानी की बात यह है कि जनता अब भी वही सवाल पूछ रही है— सड़क कब बनेगी? बिजली का बिल कब घटेगा? रोजगार कहाँ है? लेकिन नेताओं के पास इन सवालों का जवाब कम और एक-दूसरे की धार्मिक परीक्षा लेने का उत्साह ज्यादा दिखाई देता है।
लगता है राजनीति का नया नियम बन गया है— जो सबसे ज़ोर से खुद को सनातनी बताएगा, वही सबसे बड़ा धर्मरक्षक कहलाएगा। ऐसे में जनता सिर्फ दर्शक बनी बैठी है और सोच रही है कि काश, विकास पर भी इतनी ही बहस होती जितनी सनातन पर हो रही है।
व्यंग्य का निष्कर्ष:
राजनीति में सनातन का सम्मान होना चाहिए, लेकिन जब आस्था चुनावी हथियार बन जाए तो बहस धर्म की नहीं, वोटों की होने लगती है। जनता को अब नेताओं के शब्दों से ज्यादा उनके काम याद रखने होंगे।

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