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अनशन से नहीं, विश्वास से मिलता है जनसमर्थन

 


सम्पादकीय

प्रणव बजाज


सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है। लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार है, लेकिन किसी आंदोलन की सफलता केवल लंबी अवधि तक चलने से तय नहीं होती, बल्कि यह इस बात से तय होती है कि जनता उससे कितनी जुड़ती है।


लद्दाख से दिल्ली तक चले इस आंदोलन को अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिलना कई सवाल खड़े करता है। जनता अब केवल नारों और विरोध की राजनीति से प्रभावित नहीं होती, वह आंदोलन के उद्देश्य, सोच और देशहित से उसके संबंध को भी परखती है।

देश में पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक वातावरण बदला है। अब जनता विकास, सुरक्षा, राष्ट्रीय हित और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को भी उतना ही महत्व देती है। केवल सरकार विरोधी बयान या व्यवस्था की आलोचना किसी व्यक्ति को स्वत: जननायक नहीं बना सकती।

लोकतंत्र में सरकार की आलोचना जरूरी है, लेकिन आलोचना और देश के प्रति अविश्वास पैदा करने वाले बयानों के बीच अंतर बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। जो व्यक्ति जनता की भावनाओं, राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की एकता से जुड़े मुद्दों पर लगातार सवालों के घेरे में रहता है, उसके आंदोलन को व्यापक समर्थन मिलना कठिन हो जाता है।

सोनम वांगचुक जैसे शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता से देश उम्मीद करता है कि वे अपनी ऊर्जा का उपयोग समाधान खोजने में करेंगे, न कि केवल विरोध की राजनीति में। लद्दाख जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र के विकास, पर्यावरण संरक्षण और युवाओं के भविष्य के लिए उनका योगदान अधिक प्रभावी हो सकता है।

आज का भारत वह भारत नहीं है, जहां केवल सत्ता विरोधी आवाज उठाने वाला व्यक्ति हीरो बन जाता था। जनता अब हर आवाज को कसौटी पर परखती है। उसे वही नेतृत्व स्वीकार है जो देश की एकता, अखंडता और जनता के हितों को सर्वोपरि रखे।

आंदोलन लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन आंदोलन की असली ताकत जनता का विश्वास होता है। विश्वास टूट जाए तो बड़ा से बड़ा मंच भी प्रभावहीन हो जाता है।

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