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लोकतंत्र चाहिए या अराजकता? भारत विरोधी नारों की राजनीति अब बंद होनी चाहिए

 


संपादकीय

प्रणव बजाज


लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि संसद को धमकाया जाए, प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक भाषा बोली जाए, संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा कर भीड़ को उकसाया जाए और फिर उसे "छात्र आंदोलन" का नाम दे दिया जाए। लोकतंत्र का अर्थ संवाद है, हिंसा नहीं; असहमति है, अराजकता नहीं; संविधान है, सड़क का दबाव नहीं।



देश ने पिछले कुछ वर्षों में बार-बार देखा है कि कई आंदोलनों में कुछ ऐसे नारे और भाषण सामने आए जिन्होंने करोड़ों देशवासियों को आहत किया। भारत माता का अपमान, राष्ट्र की एकता पर सवाल और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने वाली भाषा किसी भी लोकतंत्र को कमजोर करती है। यदि कोई व्यक्ति कानून तोड़ता है, हिंसा भड़काता है या देश की अखंडता के विरुद्ध कार्य करता है, तो उसके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए।


राजनीतिक स्तर पर कांग्रेस के नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव, वामपंथी दलों के कई नेता तथा कुछ अन्य विपक्षी दल इस आंदोलन के समर्थन में सरकार की आलोचना कर रहे हैं। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। दूसरी ओर भाजपा और उसके समर्थकों का आरोप है कि ऐसे आंदोलनों में कुछ तत्व वैचारिक टकराव को बढ़ावा देकर देश में अस्थिरता का माहौल बनाना चाहते हैं। इन आरोपों का निर्णय राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि जांच और कानून के आधार पर होना चाहिए।


वर्षों से देश में "टुकड़े-टुकड़े गैंग", शहरी नक्सलवाद, कट्टरपंथ और अलगाववादी सोच को लेकर राजनीतिक बहस होती रही है। इन शब्दों का प्रयोग अलग-अलग दल अपने विरोधियों की आलोचना के लिए करते रहे हैं। लेकिन एक बात निर्विवाद है—भारत की संप्रभुता, संविधान और राष्ट्रीय एकता से बड़ा कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं हो सकता।


आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र बनें, राजनीतिक हिंसा के नहीं। छात्रों को रोजगार, अनुसंधान और नवाचार की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, न कि ऐसे संघर्षों में धकेला जाना चाहिए जिनका उद्देश्य केवल राजनीतिक लाभ हो।


देश को भी यह समझना होगा कि विरोध का अधिकार और राष्ट्रहित साथ-साथ चल सकते हैं। यदि किसी आंदोलन में हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान, नफरत फैलाने वाले नारे या संवैधानिक संस्थाओं को गिराने जैसी बातें सामने आती हैं, तो उस पर कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होना लोकतंत्र की रक्षा है, लोकतंत्र का दमन नहीं।


भारत ने विभाजन का दर्द झेला है, आतंकवाद का सामना किया है और हजारों सैनिकों का बलिदान देखा है। इसलिए भारत को कमजोर करने वाली किसी भी मानसिकता—चाहे वह किसी भी विचारधारा, संगठन या राजनीतिक दल से जुड़ी हो—का लोकतांत्रिक और कानूनी तरीके से दृढ़ प्रतिरोध होना चाहिए।


लोकतंत्र की ताकत सड़क पर अराजकता से नहीं, संविधान पर आस्था से बढ़ती है। असहमति का स्वागत होना चाहिए, लेकिन भारत की एकता, अखंडता और राष्ट्रीय सम्मान से कोई समझौता नहीं हो सकता। राष्ट्र पहले है, राजनीति बाद में। यही एक सशक्त, सुरक्षित और आत्मविश्वासी भारत की पहचान है।

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