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कुर्सी गई... लेकिन 'लीक तंत्र' अभी भी सुरक्षित!

 


"मंत्री बदला, क्या व्यवस्था भी बदलेगी?"


प्रणव बजाज

देश में पेपर लीक अब कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक ऐसा "राष्ट्रीय उद्योग" बन चुका है, जिसमें हर बार दोषी बदलते हैं, लेकिन खेल वही रहता है। करोड़ों युवाओं की मेहनत लीक होती है, फिर जांच बैठती है, कुछ गिरफ्तारियां होती हैं, कोई मंत्री इस्तीफा देता है और व्यवस्था अगले पेपर लीक तक चैन की सांस लेती है।


शिक्षा मंत्री का इस्तीफा राजनीतिक जिम्मेदारी का संकेत हो सकता है, लेकिन क्या प्रश्नपत्र अब तिजोरी में बंद होंगे या फिर व्हाट्सएप विश्वविद्यालय की "अर्ली एक्सेस सेवा" पहले की तरह चलती रहेगी?

सवाल सिर्फ इतना नहीं कि कुर्सी किसकी गई। असली सवाल यह है कि पेपर लीक कराने वाले असली सरगना कब जाएंगे? हर बार छात्रों से कहा जाता है—"मेहनत करो।" लेकिन मेहनत का मुकाबला अगर पहले से बिके हुए प्रश्नपत्रों से हो, तो ईमानदार छात्र आखिर किससे लड़ें?

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि यहां परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र पहुंच जाता है, लेकिन न्याय वर्षों बाद।

अगर हर पेपर लीक के बाद केवल मंत्री बदलना ही समाधान है, तो अगली भर्ती परीक्षा से पहले इस्तीफे का प्रारूप भी प्रश्नपत्र के साथ ही छाप देना चाहिए।

युवाओं को इस्तीफा नहीं, भरोसा चाहिए।

चेहरे नहीं, व्यवस्था बदलनी चाहिए।

वरना अगला पेपर लीक होने तक यह पूरा नाटक फिर दोहराया जाएगा।

— बौद्धिक प्रतिकार

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