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मूंग पर महाभारत: किसान सड़क पर, सरकार कठघरे में*


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दोगुनी खरीदी की मांग से घिरी सरकार, भोपाल बना किसानों का जंतर-मंतर

प्रणव बजाज

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी इन दिनों किसानों के सबसे बड़े जनआंदोलन की गवाह बन गई है। प्रदेश के 19 किसान संगठनों के संयुक्त मोर्चे ने मूंग की सरकारी खरीदी बढ़ाने और उर्वरक वितरण व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर राजधानी में मोर्चा खोल दिया है। सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचे किसान अब पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। सड़क पर ही हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ, चूल्हा जलाकर भोजन और अनिश्चितकालीन डेरा इस बात का संकेत है कि यह आंदोलन अब केवल फसल का नहीं, बल्कि किसान असंतोष का प्रतीक बन चुका है।



किसानों की सबसे बड़ी मांग है कि केंद्र सरकार प्रदेश में उत्पादित मूंग की पूरी उपज या कम से कम मौजूदा लक्ष्य से दोगुनी मात्रा समर्थन मूल्य पर खरीदे। इस वर्ष केंद्र ने प्रदेश के लिए लगभग 4.54 लाख मीट्रिक टन खरीदी का लक्ष्य तय किया है, जबकि प्रदेश सरकार ने इसे बढ़ाकर 8.06 लाख मीट्रिक टन करने का आग्रह किया है। कृषि मंत्री एंदल सिंह कंसाना ने इस संबंध में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र भेजा है।


25 प्रतिशत खरीदी, 100 प्रतिशत नुकसान का डर


विवाद की जड़ केंद्र द्वारा तय सीमित खरीदी है। किसान संगठनों का कहना है कि प्रदेश में बंपर उत्पादन हुआ है, लेकिन सरकार कुल उत्पादन का केवल लगभग 25 प्रतिशत ही समर्थन मूल्य पर खरीद रही है। बाकी फसल किसानों को खुले बाजार में बेचनी पड़ रही है, जहां मूंग का भाव ₹4,000 से ₹6,000 प्रति क्विंटल के बीच है, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹8,000 प्रति क्विंटल से अधिक है। यानी हर क्विंटल पर किसानों को हजारों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है।


पंजीयन कराया, अब खरीदी से इंकार क्यों?


इस वर्ष प्रदेश के लगभग 3.47 लाख किसानों ने मूंग उपार्जन के लिए पंजीयन कराया। किसानों का सवाल है कि जब सरकार ने पंजीयन कराया तो फिर खरीदी सीमित क्यों कर दी गई? किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार पहले उम्मीद जगाती है और बाद में सीमित खरीदी का हवाला देकर किसानों को बाजार के भरोसे छोड़ देती है।


मोहन सरकार पर दबाव, फैसला केंद्र के हाथ में


आंदोलन का राजनीतिक असर भी साफ दिखाई दे रहा है। खरीदी का अंतिम निर्णय केंद्र सरकार और केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में है, लेकिन जनाक्रोश का सामना प्रदेश सरकार को करना पड़ रहा है। राजधानी की सड़कों पर प्रदर्शन, यातायात व्यवस्था प्रभावित होने और बढ़ते जनदबाव ने राज्य सरकार को सक्रिय कर दिया है। अब निगाहें केंद्र सरकार के फैसले पर टिकी हैं।


पिछले साल झुकी थी सरकार


मूंग खरीदी को लेकर पिछले वर्ष भी किसानों ने आंदोलन किया था। तब सरकार ने दबाव के बाद खरीदी का लक्ष्य बढ़ाया था। उसी अनुभव के आधार पर इस बार भी किसान मान रहे हैं कि बिना बड़े आंदोलन के समाधान संभव नहीं है।


उर्वरक व्यवस्था भी बनी नाराजगी की वजह


किसानों का दूसरा बड़ा मुद्दा रासायनिक उर्वरकों की ई-टोकन व्यवस्था है। उनका कहना है कि सीमित टोकन और सीमित उपलब्धता के कारण समय पर उर्वरक नहीं मिल पा रहा। सरकार का तर्क है कि उर्वरकों पर भारी अनुदान दिया जाता है और संतुलित उपयोग आवश्यक है, लेकिन किसान इसे व्यवहारिक नहीं मान रहे हैं।


राजनीति भी गर्म, किसान भी नाराज


मामला अब केवल कृषि नीति तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा है कि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिकाओं पर सवाल उठ रहे हैं। खरीदी का अधिकार केंद्र के पास है, जबकि जनता के आक्रोश का सामना प्रदेश सरकार कर रही है। विपक्ष इसे सरकार की विफलता बता रहा है, वहीं सरकार केंद्र से अतिरिक्त खरीदी की मंजूरी मिलने की उम्मीद जता रही है।


बौद्धिक प्रतिकार की टिप्पणी


मूंग का यह आंदोलन केवल समर्थन मूल्य का विवाद नहीं है, बल्कि यह कृषि खरीद नीति की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है। यदि उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जाता है, तो उनकी उपज की बिक्री की भी ठोस व्यवस्था होना चाहिए। पंजीयन कराने के बाद सीमित खरीदी किसानों में अविश्वास पैदा करती है। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। यदि खरीदी का लक्ष्य नहीं बढ़ाया गया तो यह आंदोलन प्रदेश की राजनीति और सरकार—दोनों के लिए लंबे समय तक चुनौती बना रह सकता है।

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