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साइलेंट स्ट्रोक' बन सकता है डिमेंशिया की वजह, बिना लक्षण भी हो सकता है बड़ा नुकसान

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नई दिल्ली। स्ट्रोक को अक्सर अचानक होने वाली गंभीर चिकित्सीय स्थिति माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार 'साइलेंट स्ट्रोक' उससे भी अधिक खतरनाक हो सकता है। इसमें मस्तिष्क को नुकसान तो पहुंचता है, लेकिन कई बार इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। यही कारण है कि अधिकांश लोगों को पता ही नहीं चलता कि उन्हें स्ट्रोक आ चुका है। समय के साथ यह स्थिति याददाश्त कमजोर होने, सोचने-समझने की क्षमता घटने और डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी का जोखिम बढ़ा सकती है।


तंत्रिका रोग विशेषज्ञों के अनुसार साइलेंट स्ट्रोक तब होता है, जब मस्तिष्क के किसी छोटे हिस्से में रक्त प्रवाह कुछ समय के लिए रुक जाता है। इससे मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रभावित होती हैं, लेकिन शरीर में लकवा, बोलने में कठिनाई या चेहरे का टेढ़ा होना जैसे सामान्य स्ट्रोक के लक्षण दिखाई नहीं देते। कई मामलों में इसका पता केवल एमआरआई या मस्तिष्क की अन्य जांच के दौरान ही चल पाता है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि उच्च रक्तचाप, मधुमेह, उच्च कोलेस्ट्रॉल, धूम्रपान, मोटापा और हृदय रोग साइलेंट स्ट्रोक के प्रमुख जोखिम कारक हैं। यदि इन बीमारियों पर नियंत्रण नहीं रखा जाए, तो भविष्य में डिमेंशिया और बार-बार स्ट्रोक होने की आशंका बढ़ सकती है।

डॉक्टरों की सलाह है कि रक्तचाप, रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें, नियमित व्यायाम करें, संतुलित भोजन लें, धूम्रपान और तंबाकू से दूर रहें तथा किसी भी प्रकार की याददाश्त संबंधी समस्या या संतुलन बिगड़ने जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट से परामर्श लें। समय पर पहचान और उपचार से मस्तिष्क को होने वाले स्थायी नुकसान के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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