प्रणव बजाज
संपादकीय
भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में रक्षा, प्रौद्योगिकी, निवेश और रणनीतिक साझेदारी के नए शिखर तक पहुंचे हैं। लेकिन अब यही संबंध एक ऐसे मोड़ पर खड़े दिखाई दे रहे हैं, जहां भू-राजनीति और व्यापार आमने-सामने हैं।
अमेरिकी सीनेट में तेजी से आगे बढ़ रहे "लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट, 2026" ने नई चिंता पैदा कर दी है। यदि यह विधेयक कानून बनता है और इसके प्रावधान लागू होते हैं, तो रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का रास्ता खुल सकता है। भारत, जो आज अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा रियायती रूसी कच्चे तेल से पूरा कर रहा है, सीधे इसके दायरे में आ सकता है।
यह केवल व्यापार का मुद्दा नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई, विदेशी नीति और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा प्रश्न है।
रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिर हैं। ऐसे समय में भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए सस्ता रूसी तेल खरीदा। इससे देश को अरबों डॉलर की बचत हुई और घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव सीमित रहा। यदि अचानक इस विकल्प पर आर्थिक दंड लगाया जाता है, तो भारत को महंगे स्रोतों से तेल खरीदना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर परिवहन, उद्योग, कृषि और आम नागरिक की जेब पर पड़ेगा।
दूसरी ओर, भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता भी अधर में लटका हुआ है। यदि एक ओर व्यापार समझौते की बात हो और दूसरी ओर दंडात्मक टैरिफ की चेतावनी दी जाए, तो स्वाभाविक रूप से विश्वास का संकट पैदा होगा। साझेदारी दबाव से नहीं, बल्कि पारस्परिक सम्मान और समान हितों से मजबूत होती है।
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है। भारत ने न तो रूस के साथ अपने संबंध छोड़े हैं और न ही अमेरिका के साथ सहयोग कम किया है। यही संतुलन उसकी सबसे बड़ी ताकत रहा है। ऐसे में किसी एक पक्ष द्वारा आर्थिक दबाव बनाना भविष्य के संबंधों को जटिल बना सकता है।
भारत को भी अब केवल प्रतिक्रिया देने के बजाय दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन, नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करना समय की मांग है। साथ ही अमेरिका के साथ उच्च स्तर पर कूटनीतिक संवाद जारी रखना भी उतना ही आवश्यक होगा।
भारत और अमेरिका दोनों लोकतांत्रिक साझेदार हैं। यदि दोनों देश वास्तव में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और आर्थिक सहयोग चाहते हैं, तो टैरिफ की राजनीति से अधिक भरोसे की राजनीति को महत्व देना होगा।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या वैश्विक साझेदारियां राष्ट्रीय हितों का सम्मान करेंगी, या फिर व्यापार को दबाव का हथियार बनाकर नई आर्थिक लड़ाइयों की शुरुआत होगी?

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