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वक्फ बोर्ड की नियुक्ति पर सवाल: क्या पृष्ठभूमि की पूरी पड़ताल के बाद मिला मनोज मालपानी को पद?

 


विशेष खोजी रिपोर्ट | बौद्धिक प्रतिकार

प्रणव बजाज

भोपाल/इंदौर। मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में इंदौर के कारोबारी मनोज मालपानी की सदस्य के रूप में नियुक्ति के बाद सरकार की चयन प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे मालपानी का नाम वर्षों से विभिन्न विवादों और आंदोलनों के कारण चर्चा में रहा है। अब विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि सरकार स्पष्ट करे कि नियुक्ति से पहले संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि का किस स्तर पर परीक्षण किया गया।


वर्ष 2006 में इंदौर के एमआईजी थाने में हुए एक चर्चित घटनाक्रम में तत्कालीन बजरंग दल नेता मनोज मालपानी प्रदर्शनकारियों के साथ थाने पहुंचे थे। उस समय आरोपी विक्रम उर्फ विक्की की गिरफ्तारी की मांग को लेकर प्रदर्शन हुआ। उपलब्ध समाचार अभिलेखों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ता थाने के भीतर पहुंच गए और मनोज मालपानी थाना प्रभारी के कक्ष में जाकर उनकी सरकारी कुर्सी पर बैठ गए। बाद में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के आश्वासन के बाद प्रदर्शन समाप्त हुआ।

मनोज मालपानी इंदौर के रियल एस्टेट क्षेत्र से भी जुड़े हैं। सार्वजनिक कंपनी अभिलेखों के अनुसार, वे शुभ-लाभ रियलिटी लिमिटेड तथा माजा कंस्ट्रक्शन्स प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियों में निदेशक रहे हैं। इन कंपनियों में उनके भाई निलेश मालपानी और पिता सत्यनारायण मालपानी का भी नाम निदेशक के रूप में दर्ज है।

अब सरकार के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वक्फ बोर्ड जैसे वैधानिक निकाय में नियुक्ति से पहले क्या गृह विभाग, पुलिस, राजस्व विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों से पृष्ठभूमि संबंधी रिपोर्ट ली गई थी? यदि ली गई थी, तो उसका आधार क्या था? यदि नहीं, तो भविष्य में ऐसी नियुक्तियों के लिए क्या मानक अपनाए जाएंगे?

बौद्धिक प्रतिकार इस मामले में राज्य सरकार से निम्नलिखित सवाल पूछता है:

क्या नियुक्ति से पहले पुलिस सत्यापन कराया गया?

क्या किसी पुराने विवाद या न्यायालयीन प्रकरण की समीक्षा की गई?

चयन के लिए क्या निर्धारित मानदंड अपनाए गए?

क्या हितों के संभावित टकराव (यदि कोई हो) का मूल्यांकन किया गया?

नोट: इस रिपोर्ट में उल्लिखित 2006 की घटना और कंपनी संबंधी जानकारी सार्वजनिक अभिलेखों पर आधारित है। किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध किसी आरोप को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता जब तक सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा निर्धारित न किया गया हो। यदि मनोज मालपानी या मध्य प्रदेश सरकार इस विषय पर अपना पक्ष देना चाहें, तो बौद्धिक प्रतिकार उसे समान प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।

बौद्धिक प्रतिकार द्वारा मनोज मालपानी एवं उनके रिश्तेदारों से संपर्क करके उनका पक्ष जानने का भी प्रयास किया गया परंतु उनके द्वारा कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई । उक्त कार्टून केवल सरकार की नीति एवं कुछ चुनिंदा लोगों को फ़ायदा पहुँचाने पर कटाक्ष है अतः इसे कटाक्ष ke रूप में लिया जाए

*कल की पड़ताल:

"मनोज मालपानी: कारोबारी सफर, सार्वजनिक रिकॉर्ड और वक्फ बोर्ड तक का सफर।"*

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