कांग्रेस विधायक महेश परमार के सवाल से प्रशासनिक जवाबदेही पर बहस तेज, विपक्ष बोला- पारदर्शिता से बच रही सरकार
भोपाल। मध्य प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में भोपाल और उज्जैन संभाग के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) तथा राज्य प्रशासनिक सेवा (एसएएस) अधिकारियों को लेकर कांग्रेस विधायक महेश परमार ने सरकार से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे। उन्होंने जानना चाहा कि इन दोनों संभागों में कार्यरत अधिकारियों पर भ्रष्टाचार, आय से अधिक संपत्ति, लोकायुक्त, आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ अथवा न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या कितनी है और किन अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है।
सरकार ने आंकड़ों से किया परहेज
विधानसभा में पूछे गए सवालों के जवाब में सरकार ने किसी अधिकारी का नाम या मामलों का विस्तृत विवरण सार्वजनिक नहीं किया। विपक्ष का आरोप है कि यदि सरकार के पास सभी विभागों का अभिलेख उपलब्ध है, तो स्पष्ट जानकारी देने में हिचक क्यों दिखाई गई। इससे यह संदेश जाता है कि सरकार प्रशासनिक तंत्र को सार्वजनिक जवाबदेही से बचाना चाहती है।
भोपाल और उज्जैन क्यों बने चर्चा का केंद्र?
भोपाल प्रदेश की प्रशासनिक राजधानी है, जहां अधिकांश वरिष्ठ अधिकारी पदस्थ रहते हैं। वहीं उज्जैन संभाग में भी कई महत्वपूर्ण विभागों के अधिकारी कार्यरत हैं। ऐसे में यदि इन अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतें या न्यायालयों में प्रकरण लंबित हैं, तो उनकी जानकारी जनता और विधानसभा के सामने रखना लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा माना जाता है।
क्या हैं नियम?
विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी अधिकारी के खिलाफ केवल शिकायत दर्ज होना और दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं। जब तक न्यायालय या सक्षम एजेंसी किसी मामले में दोष सिद्ध नहीं करती, तब तक संबंधित अधिकारी को दोषी नहीं माना जा सकता। लेकिन लंबित मामलों और विभागीय जांच की जानकारी सार्वजनिक करना सरकार की पारदर्शिता का महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है।
राजनीतिक असर
महेश परमार के सवाल के बाद प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा फिर चर्चा में है। विपक्ष इसे पारदर्शिता का प्रश्न बता रहा है, जबकि सरकार का पक्ष है कि संवेदनशील और गोपनीय सूचनाओं का प्रकटीकरण नियमों के अनुरूप ही किया जा सकता है।
अब निगाह इस बात पर है कि क्या सरकार भविष्य में विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक करेगी या यह मामला केवल विधानसभा की कार्यवाही तक सीमित रह जाएगा।

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