इस आंदोलन के इस तरह के समापन को देख दिनकर जी की यह कविता सहसा ही याद आ जाती है...
दीप भांड । लेखक
जब श्रीकृष्ण दुर्योधन के पास शांति हेतु केवल पांच गांव मांगने गए तब दुर्योधन श्रीकृष्ण को वह भी देने से मना कर देता है और परिणाम हम सब जानते है...प्रधानमंत्री मोदी ने घमासान होने से बचा लिया शायद हस्तिनापुर बचा लिया।
क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है...छत्रपति शिवाजी महाराज जब औरंगजेब के द्वारा आगरा में कैद कर लिए जाते है तब महाराज वहां से निकलने के लिए बड़ी विनम्रता के साथ औरंगजेब से समझौता कर लेते है तब औरंगजेब कहता है यह चतुर,चालाक शिवाजी जिसने अफजल खान को पेट फाड़ कर मार दिया,जिसने शाहिस्ता खान की उंगलियाँ काट डाली जिसने सूरत शहर को लूट कर बदसूरत कर दिया वो कैसे इतना सरल सहज भाव से मेरी बात कैसे मान रहा है..??
क्या यहां ऐसा ही कुछ होने जा रहा है....एक नजर में देखे तो लगता है मोदी बैकफुट पर आ गए पर मन इसे इतना जल्दी स्वीकार नहीं करता।जो व्यक्ति पाकिस्तान को नियंत्रित कर सकता है।जो दशकों से सुलग रहे कशमीर को शांत कर 370 हटा सकता है।जो दशकों से लंबित श्री राम मंदिर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।जो महीनों तक चले CAA/NRC,किसान आंदोलन को सम्हाल सकता है।वो इस आंदोलन में इतनी जल्दी समझौता कर ले यह बात अपच कर जाती है।सरकार चाहती तो इस आंदोलन को और आगे जाने दे सकती थी।खैर अब यह आने वाला वक्त बताएगा किसकी क्या नीति रही किंतु महत्वपूर्ण यह है कि इन सब के बीच वास्तविक विद्यार्थियों का कितना लाभ हो पाएगा...
अमूमन यह देखा गया है जब भी सरकारें अपने तीसरे टर्म में कार्य कर रही होती है तब सरकारों की कार्यकुशलता पर संदेह होने लगता है।भ्रष्टाचार,घोटाले,मिलीभगत ऐसी तमाम खबरें अखबार में देखने,पढ़ने को मिलती है,और इन्हीं घोर त्रुटियों के कारण जनता सरकार से ऊबकर,खिन्न हो कर नई सरकार चुनती है।कांग्रेस सरकार के सत्ता परिवर्तन के समय भी यही देखा गया था...
मोदी सरकार भी उसी दौर से गुज़र रही है।सरकार को मंथन की आवश्यकता है। मोदी शासन में वर्षों पुरानी समस्याओं का समाधान पूरी तरह कर दिया गया किंतु आम जीवन में होने वाली परेशानियों पर ध्यान देना आवश्यक है, जैसे शिक्षा प्रणाली में सुधार-स्कूल कॉलेज की फीस की लूट,MBBS करना मानो असम्भव सा है।लगभग फीस 1 करोड़ ,यह क्या पढ़ा रहे है 1 करोड़ रु में।कानून प्रणाली में सुधार-हम 323 दिनों में मंगल तक पहुंच गए किंतु आज भी एक केस को सुलझाने में वर्षों लग जाते है।न्यायालय में वही भीड़,वही निराश चेहरे।
चिकित्सा का व्यवसायीकरण,अस्पतालों की लूट,दवाइयों का कमीशन,जांचों का कमीशन किसी से छुपा नहीं है।
लॉ एंड ऑर्डर की समस्या आज भी अपराध कम होने का नाम नहीं ले रहे है और शायद बढ़ते ही जा रहे है।
भारत का खाद्य मंत्रालय जैसे कही है ही नहीं।खाद्य पदार्थों में मिलावट ,ऐसा कोई उत्पाद नहीं रहा जिसमें मिलावट ना हो,ऐसा भोजन करके हम कैसे बीमारियों से दूर रह पाएंगे।
भारत आगे तो बढ़ रहा है पर इसके साथ साथ नशा पूरे भारत को जकड़ता जा रहा है।
ऐसी तमाम आम समस्याएं है जिन पर ध्यान देना आवश्यक है।
हालांकि अभी तो समय है सरकार खुद को सम्हाले और सभी विभागो,मंत्रालयों को सख्ती से नियंत्रित करे...अभी भ्रष्टाचार अदृश्य रूप से सिस्टम का हिस्सा बन बैठा है...
इस आंदोलन से एक बात और हम सीख सकते है...कोई भी बात बोलने से पहले,कोई भी शब्द बोलने से पहले हजार बार सोच लेना चाहिए...एक छोटे से शब्द काकरोच ने इतनी मजबूत,सख्त सरकार को मजबूर कर दिया अतः कृपया अपनी वाणी संयमित रखे।
जय हिंद।

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