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बौद्धिक प्रतिकार | प्रणव बजाज
भोपाल।
मध्य प्रदेश के बहुचर्चित स्वेच्छानुदान वितरण मामले में एक नया मोड़ सामने आया है। खबरें हैं कि IAS अधिकारियों के बाद अब कुछ भाजपा नेताओं और तत्कालीन जनप्रतिनिधियों को भी राहत मिलने की तैयारी चल रही है। यदि ऐसा होता है तो सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होगा कि करोड़ों रुपये के इस विवादित वितरण का जिम्मेदार आखिर कौन था?
मामला वर्ष 2010 से 2014 के बीच स्वेच्छानुदान मद से हुए करोड़ों रुपये के वितरण से जुड़ा है। जांच एजेंसियों और विभागीय जांचों में कई अनियमितताओं की बात सामने आई थी। लेकिन अब यह तर्क दिया जा रहा है कि यह मामला भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि प्रक्रियागत और प्रशासनिक त्रुटियों का था।
जनता के सवाल
यदि अधिकारियों को अभियोजन स्वीकृति नहीं मिलेगी और नेताओं को भी क्लीन चिट मिल जाएगी, तो फिर उन फैसलों की जवाबदेही किसकी होगी?
क्या सरकारी धन के वितरण में हुई कथित गड़बड़ियां केवल "फाइलों की गलती" थीं?
क्या जनता के टैक्स के पैसे के उपयोग पर जवाबदेही तय किए बिना मामले को बंद कर देना न्यायसंगत होगा?
लोकायुक्त की भूमिका पर नजर
सूत्रों के अनुसार अंतिम फैसला लोकायुक्त की सहमति और कानूनी राय पर निर्भर करेगा। यदि सहमति मिलती है तो कई वर्षों से चल रही जांच का पटाक्षेप हो सकता है।
हालांकि विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इतने बड़े मामले में यदि सभी को राहत मिलती है तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि बड़े पदों पर बैठे लोगों के लिए कानून के मायने अलग हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा ते
भोपाल के राजनीतिक गलियारों में इस संभावित फैसले को लेकर चर्चाएं तेज हैं। एक ओर इसे प्रशासनिक निर्णय बताया जा रहा है, तो दूसरी ओर इसे सत्ता और प्रभाव का परिणाम बताया जा रहा है।
अब सभी की नजर लोकायुक्त और सरकार के अगले कदम पर है। क्योंकि सवाल केवल क्लीन चिट का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और जवाबदेही का भी है।
"यदि सब निर्दोष हैं, तो फिर दोषी कौन है?" यही सवाल आज प्रदेश की जनता पूछ रही है।

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