Top News

MP में 12 रुपये से कैसे मिटेगा कुपोषण? NFHS-6 की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, 60 लाख से ज्यादा बच्चे प्रभावितHow will 12 rupees eliminate malnutrition in Madhya Pradesh? The NFHS-6 report has raised concerns, affecting over 6 million children.

 

भोपाल। मध्य प्रदेश में कुपोषण की चुनौती एक बार फिर गंभीर बहस का विषय बन गई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण NFHS-6 (2023-24) के ताजा आंकड़ों ने प्रदेश में बच्चों की पोषण स्थिति को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में कम वजन (Underweight) की दर बढ़कर 39.7 प्रतिशत पहुंच गई है, जबकि वेस्टिंग (दुबलापन) 18.9 प्रतिशत से बढ़कर 23.8 प्रतिशत हो गई है।


विशेषज्ञों का कहना है कि ये आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में लाखों बच्चे अभी भी पर्याप्त और संतुलित पोषण से वंचित हैं। रिपोर्ट के अनुसार हर तीन में एक बच्चा ठिगनेपन (Stunting) का शिकार है और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति शहरी इलाकों की तुलना में अधिक चिंताजनक है।

3,768 करोड़ का बजट, फिर भी सवाल बरकरार

प्रदेश सरकार महिला एवं बाल विकास विभाग के माध्यम से आंगनवाड़ी केंद्रों और पोषण अभियान के जरिए कुपोषण दूर करने का दावा करती है। इसके लिए हजारों करोड़ रुपये का बजट भी निर्धारित किया गया है। लेकिन जमीनी स्तर पर बच्चों को मिलने वाले पूरक पोषण आहार की राशि को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

विधानसभा में पूर्व में सरकार द्वारा दिए गए जवाब के अनुसार सामान्य बच्चों के लिए पूरक पोषण आहार पर लगभग 8 रुपये प्रतिदिन और गंभीर कुपोषित तथा अतिकम वजन वाले बच्चों पर 12 रुपये प्रतिदिन खर्च का प्रावधान रहा है। विपक्ष और पोषण विशेषज्ञों का तर्क है कि वर्तमान महंगाई में इतनी राशि से पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना बेहद कठिन है।

88 प्रतिशत बच्चों को नहीं मिल रहा संतुलित आहार

NFHS-6 की रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि 6 से 23 माह आयु वर्ग के केवल 12 प्रतिशत बच्चों को ही न्यूनतम स्वीकार्य आहार (Minimum Acceptable Diet) मिल रहा है। इसका मतलब है कि लगभग 88 प्रतिशत बच्चे उम्र के अनुसार आवश्यक पोषण प्राप्त नहीं कर रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि छह माह तक केवल स्तनपान कराने की दर घटकर 56.4 प्रतिशत रह गई है, जो पिछले सर्वेक्षण में 74 प्रतिशत थी। विशेषज्ञ मानते हैं कि जीवन के शुरुआती 1000 दिन बच्चे के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और इसी अवधि में पोषण की कमी भविष्य पर गहरा असर डालती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा गंभीर संकट

सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण इलाकों में कम वजन वाले बच्चों की संख्या 42 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। भोजन की गुणवत्ता, विविधता की कमी, गरीबी, जागरूकता का अभाव और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच को इसके प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है।

विशेषज्ञों की राय

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बजट बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। पोषण योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन, गुणवत्तापूर्ण पूरक आहार, मातृ पोषण, स्तनपान को बढ़ावा देने और स्थानीय स्तर पर निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। यदि इन पहलुओं पर गंभीरता से काम नहीं किया गया तो कुपोषण की समस्या आने वाले वर्षों में भी चुनौती बनी रह सकती है।

आंकड़ों में MP का कुपोषण संकट

कम वजन वाले बच्चे: 39.7%

वेस्टिंग (दुबले बच्चे): 23.8%

स्टंटिंग (कम लंबाई): 31.4%

न्यूनतम स्वीकार्य आहार पाने वाले बच्चे: 12%

ग्रामीण क्षेत्रों में कम वजन वाले बच्चे: 42%

छह माह तक विशेष स्तनपान: 56.4%

कुल मिलाकर NFHS-6 की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं और संस्थागत प्रसव जैसे कई क्षेत्रों में सुधार के बावजूद बच्चों का पोषण अब भी सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है। ऐसे में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या वर्तमान संसाधन और व्यवस्थाएं कुपोषण जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त हैं।

Post a Comment

Previous Post Next Post