उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों को लेकर एक नया राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। योगी सरकार द्वारा ग्राम प्रधानों को ही पंचायतों का प्रशासक नियुक्त करने के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह निर्णय पंचायती राज व्यवस्था की मूल भावना के खिलाफ है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाला कदम है।
सवाल सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश का नहीं है, बल्कि उस लोकतांत्रिक ढांचे का है जिसकी नींव गांवों की पंचायतों पर टिकी हुई है।
लोकतंत्र या सरकारी नियंत्रण?
पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नई पंचायतों के गठन तक प्रशासक नियुक्त करना एक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन जब वही व्यक्ति, जो चुनाव जीतकर आया था, प्रशासक बन जाए तो निष्पक्षता और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आलोचकों का कहना है कि सरकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के बजाय पंचायतों को प्रशासनिक नियंत्रण में रखना चाहती है। यदि चुनाव समय पर नहीं हो रहे, तो उसका समाधान चुनाव कराना है, न कि अस्थायी व्यवस्थाओं को स्थायी रूप देना।
गांव की सरकार या सत्ता का विस्तार?
पंचायती राज व्यवस्था का उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण था। गांव अपने फैसले स्वयं लें, स्थानीय विकास की दिशा स्वयं तय करें। लेकिन जब पंचायतों के ऊपर प्रशासनिक हस्तक्षेप बढ़ता है, तो सवाल उठता है कि क्या गांवों की स्वायत्तता धीरे-धीरे खत्म की जा रही है?
आज उत्तर प्रदेश में यह बहस सिर्फ कानूनी नहीं, राजनीतिक भी बन चुकी है।
हाईकोर्ट की निगाहें
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। अदालत का रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मामला संविधान के 73वें संशोधन और पंचायती राज संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है।
यदि अदालत को लगे कि सरकार का निर्णय कानून की भावना के विपरीत है, तो यह फैसला रद्द भी हो सकता है। वहीं सरकार अपने फैसले को प्रशासनिक आवश्यकता बताकर उसका बचाव करेगी।
सबसे बड़ा सवाल
यदि ग्राम पंचायतें लोकतंत्र की पहली सीढ़ी हैं, तो क्या उन्हें चुनाव के बजाय प्रशासनिक आदेशों के भरोसे चलाना उचित है?
गांव की सरकार जनता चुने या सरकार तय करे?
यही सवाल अब हाईकोर्ट के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। और इसका जवाब केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश की पंचायती व्यवस्था के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।** लोकतंत्र की असली परीक्षा संसद में नहीं, गांव की चौपाल में होती है।**

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