प्रणव बजाज
भारत में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का केंद्र रही है। वर्षों से हिंदू संगठनों और गौ-सेवा संस्थाओं द्वारा गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठती रही है। लेकिन अब जब कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी यह मांग उठाई है, तब राजनीतिक गलियारों में एक नया सवाल खड़ा हो गया है—क्या भाजपा असमंजस में है?
भाजपा ने दशकों तक गौ-संरक्षण को अपनी वैचारिक पहचान का हिस्सा बनाया। चुनावी मंचों से लेकर संसद तक गाय की चर्चा होती रही। कई राज्यों में गौहत्या निषेध कानून भी बनाए गए। लेकिन राष्ट्रीय पशु घोषित करने के मुद्दे पर केंद्र सरकार अब तक निर्णायक कदम नहीं उठा सकी।
मांग नई नहीं, लेकिन समर्थन नया है
दिलचस्प बात यह है कि यह मांग पहली बार केवल हिंदू संगठनों तक सीमित नहीं है। कुछ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि इससे सामाजिक सौहार्द बढ़ेगा और देश की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान मिलेगा।
फिर सवाल उठता है कि यदि विभिन्न समुदायों से समर्थन मिल रहा है, तो सरकार आगे क्यों नहीं बढ़ रही?
राजनीति का गणित कहीं भारी तो नहीं?
राजनीति में फैसले केवल भावनाओं से नहीं, समीकरणों से भी तय होते हैं। भाजपा को शायद यह आशंका हो सकती है कि ऐसा कदम विपक्ष को नया मुद्दा दे देगा। कुछ दल इसे धार्मिक एजेंडा बताकर ध्रुवीकरण का आरोप लगा सकते हैं
दूसरी ओर, भाजपा का परंपरागत समर्थक वर्ग भी पूछ सकता है कि जब वर्षों से यह मांग की जा रही थी, तब सरकार ने अब तक फैसला क्यों नहीं लिया?
सड़क पर गाय, भाषणों में गौरव
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि देश में गाय को माता कहने वालों की कमी नहीं, लेकिन सड़कों पर घूमती हजारों बेसहारा गायें आज भी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं। यदि गाय वास्तव में राष्ट्रीय सम्मान का विषय है, तो पहले उसके संरक्षण, चारे, चिकित्सा और आश्रय की मजबूत व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जाती?
राष्ट्रीय पशु घोषित करने से पहले क्या गायों की वास्तविक स्थिति सुधारना अधिक जरूरी नहीं है?
निर्णय का समय
यदि भाजपा इस मांग का समर्थन करती है, तो उसे केवल घोषणा तक सीमित नहीं रहना होगा। उसे यह भी बताना होगा कि राष्ट्रीय पशु बनने के बाद गायों की सुरक्षा, संरक्षण और संवर्धन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर क्या नीति बनेगी।
और यदि सरकार इस मांग को स्वीकार नहीं करती, तो उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि वर्षों से जिस मुद्दे को सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बताया गया, उस पर निर्णायक कदम क्यों नहीं उठाया गया।
अंतिम सवाल
क्या गाय का मुद्दा वास्तव में राष्ट्रहित का विषय है या फिर यह केवल चुनावी मौसम का राजनीतिक औजार बनकर रह गया है?
देश जवाब चाहता है। क्योंकि गाय पर सबसे ज्यादा राजनीति हुई है, लेकिन शायद सबसे कम नीति बनी है।

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