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भाषणों में स्वर्ण युग, जेब में आर्थिक दुर्गतिGolden age in speeches, economic misery in pockets

 

प्रणव बजाज

देश में इन दिनों दो अर्थव्यवस्थाएं समानांतर चल रही हैं। एक वह, जो सरकारी भाषणों, विज्ञापनों और मंचों पर दिखाई देती है; दूसरी वह, जो बाजार, जेब और रसोई में महसूस होती है। पहली अर्थव्यवस्था लगातार उड़ान भर रही है, जबकि दूसरी हर महीने घर का बजट बनाते समय हांफती नजर आती है।


सरकार का दावा है कि देश दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यह सुनकर आम आदमी को खुशी भी होती है और हैरानी भी। खुशी इसलिए कि उसका देश आगे बढ़ रहा है, और हैरानी इसलिए कि उसे यह प्रगति अपने आसपास कहीं दिखाई नहीं देती। उसे तो बस सब्जियों के बढ़ते दाम, महंगी शिक्षा, महंगा इलाज और सिकुड़ती बचत दिखाई देती है।

निवेश की स्थिति भी कम दिलचस्प नहीं है। बड़े-बड़े निवेश सम्मेलनों में हजारों करोड़ रुपये के समझौते होते हैं। मंच पर तालियां बजती हैं, तस्वीरें खिंचती हैं और अगले दिन अखबारों में सुर्खियां बनती हैं। लेकिन जमीन पर पहुंचते-पहुंचते इन निवेशों का जोश वैसा ही ठंडा पड़ जाता है, जैसा चुनाव खत्म होने के बाद नेताओं का जनता के प्रति उत्साह।

असमानता का हाल यह है कि देश में कुछ लोगों की संपत्ति इतनी तेजी से बढ़ रही है कि उनकी दौलत की गिनती के लिए नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। दूसरी तरफ करोड़ों लोग हर महीने यह गणित लगाते हैं कि वेतन पहले खत्म होगा या महीना। एक वर्ग के लिए अर्थव्यवस्था अवसरों का उत्सव है, तो दूसरे के लिए खर्चों का संघर्ष।

वैश्विक संकटों का असर भी बड़ा विचित्र है। दुनिया के किसी कोने में युद्ध छिड़ जाए तो पेट्रोल महंगा हो जाता है। किसी समुद्री मार्ग में बाधा आ जाए तो महंगाई बढ़ जाती है। ऐसा लगता है कि दुनिया की हर परेशानी का बिल आखिरकार भारतीय उपभोक्ता के नाम ही कटता है।

सबसे रोचक दृश्य तब होता है जब अर्थव्यवस्था पर बहस शुरू होती है। सरकार उपलब्धियों की सूची गिनाती है, विपक्ष विफलताओं का लेखा-जोखा पेश करता है और विशेषज्ञ सुधारों की लंबी सूची पढ़ते हैं। लेकिन आम आदमी इन सबके बीच बस यह जानना चाहता है कि उसकी आय से ज्यादा तेजी से उसके खर्च क्यों बढ़ रहे हैं।

आर्थिक सुधारों की चर्चा हर वर्ष होती है। श्रम सुधार, कर सुधार, निवेश सुधार और न जाने कितने सुधार। लेकिन इन सुधारों का हाल भी नए साल के संकल्पों जैसा है—शुरुआत बड़े उत्साह से होती है और अंत चुपचाप।

यही कारण है कि आज देश का सबसे बड़ा व्यंग्य यह नहीं है कि अर्थव्यवस्था चुनौतियों से जूझ रही है। सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि जनता बेचैन है, बाजार असमंजस में है, निवेश सुस्त है, असमानता बढ़ रही है, लेकिन सत्ता पूरी तरह आश्वस्त है कि सब कुछ शानदार चल रहा है।

शायद इसी का नाम आधुनिक आर्थिक आशावाद है—जहां आंकड़े मुस्कुराते हैं और नागरिक चिंतित रहते हैं।

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