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बंगाल में हिंसा, तमिलनाडु में सियासी हलचल; लोकतंत्र के दो चेहरेViolence in Bengal, political unrest in Tamil Nadu: The two faces of democracy

सम्पादकीय



पश्चिम बंगाल एक बार फिर चुनाव बाद हिंसा की चपेट में है। लोकतंत्र के उत्सव के रूप में देखे जाने वाले चुनाव के बाद जिस प्रकार आगजनी, तोड़फोड़ और राजनीतिक प्रतिशोध की घटनाएं सामने आ रही हैं, वह न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को भी आघात पहुंचाती हैं। सत्ता परिवर्तन या जीत-हार के बाद यदि सड़कों पर हिंसा हावी हो जाए, तो यह जनादेश की गरिमा को कमजोर करता है।

पश्चिम बंगाल में इस तरह की घटनाएं कोई नई नहीं हैं, लेकिन हर बार यह उम्मीद की जाती है कि हालात सुधरेंगे। दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक दलों के बीच टकराव आम नागरिकों की सुरक्षा पर भारी पड़ रहा है। प्रशासन और निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी केवल चुनाव संपन्न कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि परिणाम के बाद शांति बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। दोषियों पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई ही स्थिति को नियंत्रित कर सकती है।

इसके विपरीत, तमिलनाडु में सत्ता गठन को लेकर तेज होती गतिविधियां लोकतांत्रिक प्रक्रिया के दूसरे पहलू को सामने लाती हैं। वहां जनादेश के बाद सरकार बनाने की कवायद तेज हो गई है और राजनीतिक दल गठबंधन, समर्थन और नेतृत्व को लेकर सक्रिय हैं। यह स्थिति बताती है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता हस्तांतरण संभव है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि बंगाल जैसी घटनाओं से सबक लिया जाए और लोकतंत्र को केवल मतदान तक सीमित न रखा जाए। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनादेश जनता का होता है, किसी एक दल का नहीं। हिंसा से न तो राजनीतिक वर्चस्व स्थापित होता है और न ही जनसमर्थन बढ़ता है।

देश के अलग-अलग राज्यों में सामने आ रही ये दो तस्वीरें एक स्पष्ट संदेश देती हैं—जहां संयम, संवाद और संवैधानिक मर्यादा है, वहीं लोकतंत्र मजबूत होता है; और जहां हिंसा और टकराव है, वहां लोकतंत्र कमजोर पड़ता है। अब यह तय राजनीतिक दलों और प्रशासन को करना है कि वे किस रास्ते पर आगे बढ़ना चाहते हैं।

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