तमिल सिनेमा के सुपरस्टार विजय की राजनीति में एंट्री अचानक नहीं मानी जा रही, बल्कि इसकी नींव उनके फिल्मी करियर के दौरान ही रखी जा चुकी थी। साल 2009 में उन्होंने अपने फैन क्लब्स के लिए ‘उन्नाल मुदियुम’ (तुम कर सकते हो) का नारा और झंडा जारी किया, जिसे उनके राजनीतिक इरादों का पहला संकेत माना गया। इसके बाद 2013 में आई फिल्म थलाइवा की टैगलाइन ‘टाइम टू लीड’ ने भी उनके नेतृत्व की छवि को मजबूत किया।
इसके बाद मर्सल, सरकार और बिगिल जैसी फिल्मों में विजय ने खुद को आम जनता के रक्षक और अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले किरदार में पेश किया। इन फिल्मों में भ्रष्टाचार, किसानों की समस्याएं और चुनावी धांधली जैसे मुद्दों को उठाकर उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की।
विजय की ताकत सिर्फ उनकी फिल्मों तक सीमित नहीं रही। उनके फैन क्लब विजय मक्कल इयक्कम ने वर्षों तक समाज सेवा के जरिए एक मजबूत जमीनी नेटवर्क तैयार किया। यही नेटवर्क आगे चलकर राजनीतिक आधार बना। 2021 के ग्रामीण स्थानीय निकाय चुनावों में इस नेटवर्क से जुड़े सदस्यों ने 100 से अधिक सीटें जीतकर अपनी ताकत का एहसास करा दिया।
राजनीतिक एंट्री के बाद विजय ने खुद को एक साफ-सुथरी छवि वाले नेता के रूप में पेश किया है। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, सामाजिक न्याय, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई और तमिल अस्मिता जैसे मुद्दों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया है। उनका लक्ष्य तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से स्थापित द्रविड़ दलों के वर्चस्व को चुनौती देना है।
दरअसल, तमिलनाडु में 1967 से द्रविड़ राजनीति का दबदबा रहा है। सी. अन्नादुरई के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कझगम सत्ता में आई और बाद में अन्नाद्रमुक ने उसे कड़ी टक्कर दी। एम. जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता जैसे फिल्मी सितारों ने भी राजनीति में बड़ी सफलता हासिल की, जबकि एम. करुणानिधि की मजबूत छवि ने द्रमुक को लंबे समय तक ताकत दी।
ऐसे में अब विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम इस लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक संतुलन को बदलने की कोशिश में हैं। उनकी एंट्री ने तमिलनाडु की राजनीति में एक नए विकल्प और नई बहस को जन्म दे दिया है, खासकर युवाओं और महिलाओं के बीच उनकी पकड़ तेजी से मजबूत होती दिख रही

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