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जंग रुकी, शक नहीं: पाकिस्तान की भूमिका पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?The war has stopped, there is no doubt: Why are questions being raised on Pakistan's role?

[ट्रंप के यू-टर्न के पीछे की असली कहानी: तेल, दबाव और डर]



 प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

मध्य पूर्व की धधकती धरती पर जब चारों ओर बारूद, धमकियों और विनाश की गूंज फैल रही थी, तभी अचानक शांति की ऐसी खबर सामने आई जिसने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो कुछ घंटे पहले तक ईरान को “सभ्यता के अंत” की चेतावनी दे रहे थे, अचानक दो सप्ताह के युद्ध विराम के लिए तैयार हो गए। उनकी केवल एक शर्त थी—ईरान तुरंत और सुरक्षित ढंग से होर्मुज स्ट्रेट खोल दे। यही वह समुद्री मार्ग है, जिससे दुनिया के बड़े हिस्से तक तेल पहुंचता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह फैसला पाकिस्तान की चौंकाने वाली कूटनीति की जीत था, या फिर अमेरिका अपनी ही भड़काई आग में फंसकर पीछे हटने पर मजबूर हो गया?

ट्रंप की इस घोषणा ने वैश्विक राजनीति की पूरी बिसात ही पलट दी। दुनिया युद्ध के छठे सप्ताह में पहुंच चुकी थी। तेल की कीमतें लगातार आसमान छू रही थीं, शेयर बाजार दहशत में डूबे थे और पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं पर संकट की रेखाएं साफ नजर आने लगी थीं। ऐसे निर्णायक मोड़ पर ट्रंप ने सोशल मीडिया पर खुलासा किया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से बातचीत के बाद उन्होंने ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई को दो सप्ताह के लिए टालने का फैसला किया है। इसके तुरंत बाद ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में बातचीत तय हुई और पूरे क्षेत्र में पहली बार ऐसा लगा कि बारूद के बीच भी शांति की राह निकल सकती है।

इस संकट में पाकिस्तान ने खुद को केवल पड़ोसी देश नहीं, बल्कि मुख्य मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश की। शहबाज शरीफ ने ट्रंप से युद्ध टालने की अपील की, जबकि ईरान से होर्मुज स्ट्रेट खोलने को कहा। रातभर आसिम मुनीर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वांस और विशेष दूतों के संपर्क में रहे। दावा है कि ईरान की दस सूत्रीय योजना भी पाकिस्तान के जरिए वॉशिंगटन पहुंची। इस्लामाबाद ने ईरान से पुराने रिश्तों और अमेरिका से सैन्य साझेदारी के बीच संतुलन साधा, लेकिन इसी ने उसकी नीयत पर सवाल खड़े कर दिए। मिस्र और तुर्की को साथ जोड़कर पाकिस्तान ने संकेत दिया कि वह केवल क्षेत्रीय खिलाड़ी नहीं, बल्कि संकट में खुद को अनिवार्य शक्ति साबित करना चाहता है।

पाकिस्तान की यह भूमिका जितनी प्रभावशाली दिखती है, उतनी ही संदेहों से घिरी भी है। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस्लामाबाद ने शांति से अधिक अपनी घटती वैश्विक हैसियत बचाने का मौका देखा। एक तरफ वह अमेरिका का करीबी सुरक्षा साझेदार है, दूसरी तरफ ईरान से उसके धार्मिक, भौगोलिक और राजनीतिक संबंध हैं। ऐसे में दोनों पक्षों को साथ रखने की उसकी कोशिश क्या वास्तव में संतुलन है, या केवल अपना प्रभाव बढ़ाने की चाल? फिलहाल यह रणनीति उसके पक्ष में दिख रही है, लेकिन यही दांव आगे सबसे बड़ा संकट बन सकता है। वार्ता विफल हुई या किसी एक पक्ष ने उसे पक्षपाती माना, तो पाकिस्तान दोनों ओर से अविश्वास और अलगाव का सामना कर सकता है।

ट्रंप के कदम पीछे खींचने की असली वजह पाकिस्तान नहीं, अमेरिका की बढ़ती मजबूरी थी। होर्मुज स्ट्रेट बंद होते ही तेल आपूर्ति पर असर पड़ा और अमेरिकी बाजार, महंगाई व ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ गया। चुनावी माहौल में ट्रंप जानते थे कि महंगाई की चोट उन्हें राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकती है। इजरायल लगातार ईरान पर कड़ी कार्रवाई चाहता था, लेकिन लंबा युद्ध अमेरिका की छवि भी बिगाड़ रहा था। वह “विश्व पुलिस” नहीं, बल्कि “युद्ध को हवा देने वाली शक्ति” नजर आने लगा था। ऐसे में ट्रंप के सामने विकल्प साफ था—या तो युद्ध बढ़ाकर संकट गहराएं, या पीछे हटकर नुकसान सीमित करें। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।

ईरान ने युद्धविराम को दबाव में लिया गया फैसला नहीं, बल्कि शर्तों से जुड़ा समझौता माना। तेहरान ने साफ कर दिया कि उसे कुछ दिनों की राहत नहीं, स्थायी समाधान चाहिए। उसकी मांगों में प्रतिबंधों में ढील, पुनर्निर्माण सहायता और भविष्य में हमले न करने की गारंटी शामिल है। ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट खोलने के संकेत दिए, लेकिन बदले में अमेरिका से स्पष्ट राजनीतिक भरोसा मांगा। इसी वजह से वह शुरुआत में दो सप्ताह के अस्थायी विराम पर तैयार नहीं हुआ। पाकिस्तान बीच में अपनी भूमिका दिखाता रहा, लेकिन निर्णायक दबाव चीन ने बनाया। इससे साफ है कि यह केवल दो देशों का टकराव नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन की लड़ाई है।

इस युद्धविराम का सबसे गहरा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा। होर्मुज स्ट्रेट खुलने की संभावना से तेल बाजार को राहत मिली। भारत जैसे देशों के लिए यह अहम है, क्योंकि उनका अधिकांश तेल इसी रास्ते से आता है। रास्ता बंद रहता, तो पेट्रोल-डीजल और खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती थीं। लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। इजरायल सतर्क है, लेबनान और हिजबुल्लाह के बीच तनाव जारी है। ऐसे में क्या इस्लामाबाद की वार्ता सचमुच समाधान दे पाएगी, या केवल संकट को कुछ समय के लिए टाल रही है? अगर दो सप्ताह बाद बातचीत विफल हुई, तो यह टकराव और खतरनाक हो सकता है। यह युद्धविराम शांति नहीं, केवल अस्थायी विराम लगता है।

धुआं अभी थमा है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल बाकी है—इस विराम के पीछे असली जीत किसकी है? पाकिस्तान खुद को संकट का समाधानकर्ता बता रहा है, पर क्या उसने सचमुच हालात बदले, या केवल अमेरिका की मजबूरी को अपनी उपलब्धि बना लिया? अमेरिका पहले ही महंगाई, चुनावी दबाव और वैश्विक आलोचना से घिरा था। दूसरी ओर ईरान ने दिखा दिया कि होर्मुज स्ट्रेट बंद कर वह पूरी दुनिया पर दबाव बना सकता है। अब फैसला 10 अप्रैल की वार्ता करेगी। वहीं साफ होगा कि यह शांति की शुरुआत है, या अगली टकराव से पहले का सन्नाटा।


 

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