Top News

ग्राम पंचायतों पर दबंगों का कब्जा! सरपंच सिर्फ नाम के, असली खेल ‘रसूखदारों’ के हाथ मेंThugs Seize Control of Gram Panchayats! Sarpanchs Are Mere Figureheads; the Real Power Lies in the Hands of the 'Influential Elite'



मध्य प्रदेश के कई ग्रामीण इलाकों से लोकतंत्र को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आ रही है। पंचायतों में चुने गए सरपंचों की जगह अब असली नियंत्रण कथित दबंगों और रसूखदारों के हाथ में जाता दिख रहा है।

इंदौर के असरावद बुजुर्ग जैसे गांवों में हालात ऐसे हैं कि सरपंच पद पर भले ही कोई और बैठा हो, लेकिन फैसले कहीं और से तय हो रहे हैं। पंचायत की फाइलों से लेकर योजनाओं की मंजूरी तक, हर काम पर बाहरी प्रभाव का आरोप लग रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि कई जगह सरपंचों को सिर्फ “मोहरे” की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। असली नियंत्रण उन लोगों के पास है जिनके पास पैसा, ताकत या राजनीतिक पहुंच है। पंचायत की बैठकों में भी वही लोग हावी रहते हैं और फैसले उन्हीं के इशारे पर होते हैं।

सबसे गंभीर आरोप यह है कि सरकारी योजनाओं में आने वाली राशि का उपयोग पारदर्शी तरीके से नहीं हो रहा। गांव के विकास के नाम पर बजट निकलता है, लेकिन जमीनी स्तर पर काम अधूरा या कागजों तक सीमित रह जाता है।

इस पूरे मामले में पंचायत सचिव, रोजगार सहायक और स्थानीय प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत की भी चर्चा है। आरोप है कि बिना उनकी सहमति के कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती।

महिला और आरक्षित वर्ग के सरपंचों की स्थिति और भी कमजोर बताई जा रही है। कई मामलों में उनके नाम पर पद तो है, लेकिन अधिकार नहीं। निर्णय लेने की ताकत उनसे छीन ली जाती है, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पंचायत स्तर पर ही लोकतंत्र कमजोर होगा, तो इसका असर पूरे सिस्टम पर पड़ेगा। पंचायत राज व्यवस्था का मकसद गांवों को आत्मनिर्भर बनाना था, लेकिन मौजूदा हालात उस उद्देश्य को कमजोर करते नजर आ रहे हैं।

अब मांग उठ रही है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, पंचायतों के कामकाज का सोशल ऑडिट कराया जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या गांवों का लोकतंत्र कागजों तक सिमट जाएगा, या फिर सच में सरपंचों को उनका अधिकार वापस मिलेगा?

Post a Comment

Previous Post Next Post