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पति का कर्ज नहीं घटा सकता भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाई गुजारा भत्ता राशिStating that a husband's debts cannot diminish his responsibility to provide maintenance, the Supreme Court has increased the alimony amount.

 


सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी प्राथमिक है और इसे कर्ज चुकाने जैसे निजी वित्तीय दायित्वों के आधार पर कम नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि कर्ज से संपत्ति बन रही है, तो उसे आवश्यक खर्च नहीं माना जा सकता। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने पत्नी को मिलने वाले मासिक भरण-पोषण को 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये किया। मामला उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें पत्नी ने अलग रहने के बाद 50,000 रुपये मासिक भरण-पोषण की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने पहले 8,000 रुपये और बाद में हाईकोर्ट ने 15,000 रुपये तय किए, जिससे असंतुष्ट होकर पत्नी सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

पत्नी की ओर से दलील दी गई कि पति की आय का सही आकलन नहीं किया गया, क्योंकि उसकी सैलरी से कर्ज की किश्तों जैसी कटौतियों को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया। वहीं पति ने कहा कि उसकी वास्तविक आय इन देनदारियों के कारण कम हो जाती है। कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी सम्मानपूर्वक जीवन जी सके। अदालत ने स्पष्ट किया, "कर्ज की किस्तें, खासकर जब वे संपत्ति बनाने में लगती हों आवश्यक खर्च नहीं हैं और इनसे भरण-पोषण की जिम्मेदारी कम नहीं की जा सकती।" अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि पति एक बैंक में प्रबंधक है और उसकी मासिक आय लगभग 1.15 लाख रुपये है, जबकि पत्नी की कोई स्वतंत्र आय नहीं है।

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि 25,000 रुपये प्रति माह का भरण-पोषण उचित और संतुलित है। साथ ही बकाया राशि तीन महीने में चुकाने और हर महीने की 7 तारीख तक भुगतान करने का निर्देश भी दिया।

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