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बच्चों के कपड़ों में छिपे ‘स्लो पॉइज़न’, एलर्जी से लेकर कैंसर तक का खतरा'Slow Poison' Lurking in Children's Clothing: Risks Ranging from Allergies to Cancer

 

क्या आपको अपने बच्चे चमकदार और चटख रंगों वाले कपड़ों में ही अच्छे लगते हैं? अगली बार खरीदारी करते समय इन रंगों की चमक के पीछे छिपे 'स्लो पॉइज़न' के बारे में ज़रूर सोचिएगा। हाल में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने बच्चों के कपड़ों में लेड (सीसा) की भारी मौजूदगी पाई है, जिसने दुनिया भर में खतरे की घंटी बजा दी है। जल्द ही यह मामला अमेरिकन केमिकल सोसाइटी के सामने रखा जाएगा। पत्रिका ने भारत की स्थिति जानने की कोशिश तो बेहद चिंताजनक हालात सामने आए। भारत में बच्चों के कपड़ों में ऐसे-ऐसे रसायन पाए जाने की जानकारी मिली जो विदेशों में प्रतिबंधित हैं।


तय सीमा से ज़्यादा लेड मिला

रिसर्च के अनुसार 'फास्ट-फैशन' के दौर में बच्चों की टी-शर्ट्स के हर सैंपल में सरकार द्वारा तय सीमा से कहीं ज़्यादा लेड मिला है। छोटे बच्चे अक्सर कपड़े चूसते हैं या मुंह में डालते हैं, जिससे ये रसायन सीधे उनके शरीर में पहुंचकर मस्तिष्क और शारीरिक विकास को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। टॉक्सिक्स लिंक नामक संगठन की 'टॉक्सिक थ्रेड्स' रिपोर्ट (मई 2025) ने खुलासा किया है कि भारत में 40 बड़े ब्रांड्स के कपड़ों, इनर वियर और स्कूल यूनिफॉर्म में लेड, नोनिल फेनॉल (एनपी), नोनिल फेनॉल एथोक्सिलेट (एनपीई) सहित कई किस्म के घातक रसायन उपयोग होते हैं।

प्रमुख टॉक्सिक केमिकल और उनके खतरे

1. एनपी और एनपीई (नोनिल फेनॉल)

ये केमिकल हार्मोनल असंतुलन पैदा करते हैं और कैंसर की वजह बन सकते हैं। ये यूरोपीय यूनियन और अमेरिका में प्रतिबंधित हैं, लेकिन भारत में तय सीमा से 9 गुना अधिक पाया गया है।

2. लेड (सीसा)

यह दिमाग और किडनी को सीधा नुकसान पहुंचाता हैं। साथ ही यह बच्चों में 'हाइपर एक्टिविटी' और सीखने की क्षमता में कमी का मुख्य कारण बन सकता है।

3. एजो डाई

कपड़ों को आकर्षक बनाने वाले इन रंगों से गंभीर एलर्जी और कैंसर का खतरा रहता है। दक्षिण कोरिया जैसे देशों में इस केमिकल पर पूर्ण प्रतिबंध है।

4. पीएफए (फॉरएवर केमिकल)

कभी न खत्म होने वाले ये केमिकल शरीर में जाने के बाद कभी नहीं निकल पाते। जैकेट और स्विमवियर में ज़्यादा पाए जाते हैं। यूरोपीय यूनियन इन पर कड़ा प्रतिबंध लगाने जा रहा है।

5. फॉर्मल्डेहाइड

यह केमिकल कपड़ों को 'रिंकल-फ्री' रखने के लिए इस्तेमाल होता है। इससे सांस की बीमारी और त्वचा के संक्रमण का खतरा बना रहता है।

सुरक्षा के पांच मंत्र, जागरूक बनें अभिभावक

1. टैग ज़रूर पढ़ें

कपड़ों का टैग ज़रूर पढ़ें और हमेशा '100% कॉटन' को प्राथमिकता दें। सिंथेटिक और मिश्रित कपड़ों से बचें।

2. धुलाई अनिवार्य

नए कपड़े खरीदने के बाद उन्हें कम से कम दो बार अच्छी तरह धोकर ही बच्चों को पहनाएं। इससे सतह पर मौजूद अतिरिक्त केमिकल निकल जाते हैं।

3. साधारण कपड़े बेहतर

'दाग न लगने वाले' या 'रिंकल फ्री' दावों से बचें, क्योंकि ऐसे कपड़ों में केमिकल की कोटिंग ज़्यादा होती है। साधारण कपड़ें बेहतर होते हैं।

4. यूनिफॉर्म पर नज़र

बच्चों की स्कूल यूनिफॉर्म पर भी ध्यान रखें। स्कूल प्रबंधन से मांग करें कि वो बच्चों की यूनिफॉर्म के लिए सिर्फ कॉटन फैब्रिक का ही चयन करें।

5. चमकीले रंगों से परहेज

कपड़ों पर बहुत ज़्यादा प्रिंट, रबर प्रिंटिंग या अनावश्यक एक्सेसरीज न हों, क्योंकि लेड और अन्य भारी केमिकल इन्हीं में सबसे ज़्यादा होते हैं।

निर्यात के लिए अलग नियम, देश के लिए अलग!

भारतीय टेक्सटाइल कंपनियों का दोहरा रवैया चौंकाने वाला है। जो कंपनियाँ विदेशों में निर्यात के लिए कपड़े बनाती हैं, वो इन केमिकल्स का इस्तेमाल नहीं करतीं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मानकों पर माल रिजेक्ट होने का डर रहता है। भारत में स्पष्ट नियम और कड़ी निगरानी न होने से घरेलू बाजार में इन केमिकल्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। ये केमिकल्स न सिर्फ शरीर को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि नदियों के पानी को भी जहरीला बना रहे हैं।

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