छिंदवाड़ा समेत प्रदेश के कई हिस्सों में गर्मी अपने चरम पर है। तापमान 40 डिग्री के पार पहुंच चुका है, जहां शहरों के पक्के मकान भट्टी की तरह तपने लगते हैं। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों के कच्चे घर बिना पंखा, कूलर या एसी के भी ठंडक का अहसास कराते हैं।
मिट्टी और खपरैल का कमाल
गांवों में बने पारंपरिक घरों की दीवारें मोटी और मिट्टी की होती हैं। ऊपर से खपरैल (कबेलू) की छत होती है, जो गर्मी को सीधे अंदर नहीं आने देती। इन घरों में चूने की पुताई और गोबर से लिपे फर्श-आंगन प्राकृतिक ठंडक बनाए रखते हैं।
क्यों ठंडे रहते हैं ये घर?
विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी गर्मी को जल्दी अंदर नहीं आने देती, जबकि सीमेंट और लोहा गर्मी को सोखकर लंबे समय तक छोड़ते रहते हैं। यही कारण है कि शहरों के आरसीसी मकान दिन में गर्म होकर रात तक तपते रहते हैं, जबकि कच्चे घर दिनभर ठंडे बने रहते हैं।
प्राकृतिक हवा का बेहतर प्रवाह
खपरैल की छत में छोटे-छोटे छिद्र होते हैं, जिससे घर के अंदर लगातार हवा का प्रवाह बना रहता है। इससे वेंटिलेशन अच्छा रहता है और गर्मी का असर कम होता है। यही वजह है कि कई ग्रामीण घरों में पंखे की जरूरत भी महसूस नहीं होती।
पर्यावरण के अनुकूल विकल्प
लगातार बढ़ते शहरीकरण और पेड़ों की कटाई के कारण शहरों में गर्मी ज्यादा महसूस होती है। ऐसे में कच्चे घर न केवल ठंडक देते हैं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी होते हैं।
विशेषज्ञों की राय
सिविल इंजीनियरों का मानना है कि मिट्टी और खपरैल से बने घर वैज्ञानिक दृष्टि से गर्म इलाकों के लिए बेहतर होते हैं। ये घर तापमान संतुलित रखते हैं और ऊर्जा की खपत भी कम करते हैं।
स्पष्ट है कि आधुनिक सुविधाओं के बावजूद पारंपरिक कच्चे घर गर्मी से राहत देने में आज भी कहीं आगे हैं।

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