सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश के संभल स्थित शाही जामा मस्जिद विवाद पर अहम सुनवाई होने जा रही है। यह सुनवाई मुस्लिम पक्ष की उस याचिका पर होगी, जिसमें चंदौसी कोर्ट के सर्वेक्षण आदेश को चुनौती दी गई है। कॉज लिस्ट के अनुसार जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी। मामला कानूनी ही नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक रूप से भी बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
मस्जिद समिति ने अपनी याचिका में कहा है कि सर्वे का आदेश जल्दबाजी में दिया गया और उन्हें अपनी बात रखने का पूरा अवसर नहीं मिला। उनका आरोप है कि स्थापित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, इसलिए सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप कर इस आदेश को रद्द करने की मांग की गई है।
दूसरी ओर हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही जामा मस्जिद प्राचीन हरिहर मंदिर के अवशेषों पर बनी है। उनका कहना है कि मुगल काल में मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया था, इसलिए सच्चाई सामने लाने के लिए वैज्ञानिक सर्वे जरूरी है।
इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चंदौसी ट्रायल कोर्ट के सर्वे आदेश को सही ठहराया था और इसमें कोई कानूनी खामी नहीं पाई। साथ ही मस्जिद समिति की याचिका भी खारिज कर दी गई थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट पहले ही दोनों पक्षों को विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दे चुका है। अदालत ने साफ किया है कि अंतिम निर्णय आने तक वहां किसी प्रकार का बदलाव या निर्माण नहीं किया जाएगा।
यह विवाद पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के कारण और महत्वपूर्ण हो जाता है। इस कानून के अनुसार 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था, उसे बदला नहीं जा सकता। मस्जिद पक्ष इसी कानून का हवाला देते हुए कह रहा है कि यह मामला अदालत में विचार योग्य ही नहीं है।
वहीं हिंदू पक्ष प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 का हवाला दे रहा है। उनका तर्क है कि यदि कोई संरचना ऐतिहासिक रूप से मंदिर थी, तो उसकी वास्तविकता सामने लाना जरूरी है और यह मामला 1991 के कानून के दायरे से बाहर है।
गौरतलब है कि शाही जामा मस्जिद विवाद पहले भी तनाव और हिंसा का कारण बन चुका है। सर्वे के दौरान हालात बिगड़ने से जान-माल का नुकसान हुआ था। इसी वजह से प्रशासन और अदालत दोनों इस मामले को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं।

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