सम्पादकीय
दुनिया की अर्थव्यवस्था आज जिस अस्थिरता के दौर से गुजर रही है, उसकी धड़कन कहीं न कहीं होर्मुज जलडमरूमध्य से भी जुड़ी हुई है। यह संकीर्ण समुद्री रास्ता केवल भौगोलिक महत्व का नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी मार्ग से होकर गुजरता है, ऐसे में यहां पैदा होने वाला हर तनाव सीधे वैश्विक बाजारों को प्रभावित करता है।
हाल के वर्षों में ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते टकराव ने इस क्षेत्र को और संवेदनशील बना दिया है। स्थिति यह है कि युद्ध हो या सिर्फ बयानबाजी—दोनों ही हालात में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव शुरू हो जाता है। इसका असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि महंगाई, आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक व्यापार तक फैल जाता है।
भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण है। एक ओर ऊर्जा की बढ़ती जरूरत, दूसरी ओर आयात पर निर्भरता—इन दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है। ऐसे में होर्मुज में किसी भी तरह की अस्थिरता सीधे घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकती है, जिससे आम आदमी की जेब पर असर पड़ना तय है।
हालांकि यह भी सच है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अब पहले की तुलना में अधिक लचीली हो चुकी है। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश, रणनीतिक भंडारण और बहु-आयामी कूटनीति जैसे कदम इस जोखिम को कम करने की दिशा में उठाए जा रहे हैं। लेकिन इन उपायों के बावजूद होर्मुज की भौगोलिक और रणनीतिक अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह समय केवल प्रतिक्रिया का नहीं, बल्कि दूरदर्शिता का है। वैश्विक शक्तियों को चाहिए कि वे इस क्षेत्र को टकराव का मैदान बनाने के बजाय सहयोग का केंद्र बनाएं। क्योंकि अगर होर्मुज अस्थिर होता है, तो उसका असर केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता—पूरी दुनिया इसकी कीमत चुकाती है।

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