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MP में ‘मीटर गेम’ पर 492 करोड़ खर्च, फिर भी नहीं थमी बिजली चोरी₹492 Crore Spent on ‘Meter Game’ in MP, Yet Electricity Theft Has Not Stopped

 

स्मार्ट मीटर और टेक्नोलॉजी के दावे फेल—ग्राउंड पर चोरी जारी, सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल

भोपाल/इंदौर। मध्य प्रदेश में बिजली चोरी रोकने के लिए सरकार और बिजली कंपनियों ने पिछले कुछ वर्षों में करीब 492 करोड़ रुपये “मीटर सुधार” और स्मार्ट सिस्टम पर खर्च किए, लेकिन हालात जस के तस बने हुए हैं। चोरी के मामलों में अपेक्षित कमी नहीं आई, जिससे पूरे प्रोजेक्ट की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो गए हैं।


क्या था ‘मीटर गेम’?

राज्य में बिजली वितरण कंपनियों ने बड़े स्तर पर स्मार्ट मीटर लगाने, पुराने मीटर बदलने, रिमोट मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करने और लाइन लॉस कम करने जैसे कदम उठाए। दावा किया गया था कि इससे चोरी पर लगाम लगेगी और बिलिंग में पारदर्शिता आएगी।

जमीनी हकीकत क्या है?

हालांकि कई जिलों से मिल रही रिपोर्ट्स कुछ और ही कहानी बता रही हैं। कई जगह स्मार्ट मीटर बायपास कर दिए गए हैं, डायरेक्ट लाइन यानी ‘कटिया’ डालकर बिजली ली जा रही है, मीटर से छेड़छाड़ कर रीडिंग कम दिखाई जा रही है और छापेमारी से पहले ही सूचना लीक होने के आरोप लग रहे हैं। यानी टेक्नोलॉजी आई, लेकिन चोरी के तरीके भी “अपग्रेड” हो गए।

कहाँ अटक रहा सिस्टम?

विशेषज्ञों के अनुसार समस्या सिर्फ तकनीक की नहीं बल्कि सिस्टम की है। जहां डिजिटल निगरानी होनी चाहिए, वहां अभी भी स्थानीय स्तर पर “सेटिंग” हावी है। लाइनमैन से लेकर कुछ अधिकारियों तक की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। कई मामलों में राजनीतिक दबाव के चलते कार्रवाई नहीं हो पाती और “ऊपर से फोन” आने पर फाइलें ठंडी पड़ जाती हैं। डेटा तो बन रहा है, लेकिन उस पर समय पर एक्शन नहीं लिया जा रहा।

कितना हो रहा नुकसान?

ऊर्जा विभाग के अनुमानों के अनुसार हर साल हजारों करोड़ रुपये का AT&C लॉस हो रहा है, जिसमें ट्रांसमिशन लॉस के साथ बिजली चोरी भी शामिल है। इसका सीधा असर ईमानदारी से बिल भरने वाले उपभोक्ताओं पर पड़ता है। मतलब साफ है—जो चोरी कर रहा है वह बच रहा है और जो बिल भर रहा है वही महंगी बिजली का बोझ उठा रहा है।

कार्रवाई क्या हुई?

समय-समय पर स्पेशल ड्राइव चलाए गए, हजारों कनेक्शन काटे गए और जुर्माना भी वसूला गया, लेकिन यह कार्रवाई स्थायी समाधान साबित नहीं हो पाई।

तेज सवाल:

492 करोड़ खर्च के बाद भी चोरी क्यों नहीं रुकी? क्या टेक्नोलॉजी से ज्यादा सिस्टम की नीयत कमजोर है? क्या बिना अंदरूनी मिलीभगत के इतना बड़ा खेल संभव है?

मीटर बदलने से नहीं, मंशा बदलने से रुकेगी चोरी… वरना करोड़ों खर्च होते रहेंगे और ‘करंट’ कहीं और जाता रहेगा।

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