इंदौर। (IDA) में प्रशासनिक फेरबदल को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। IDA के प्रशासनिक अधिकारी राजेंद्र पोरवाल पर गंभीर आरोप लगते हुए कहा जा रहा है कि उन्होंने संभागायुक्त, कलेक्टर, निगमायुक्त और IDA सीईओ सहित अन्य बोर्ड सदस्यों की भूमिका को ‘मूक’ बना दिया है।
सूत्रों के अनुसार, हाल ही में हुए आंतरिक बदलावों के बाद कई महत्वपूर्ण निर्णय सीमित दायरे में लिए जा रहे हैं, जिससे बोर्ड की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। आरोप है कि पोरवाल ने अपनी प्रशासनिक पकड़ मजबूत करते हुए प्रमुख पदों और जिम्मेदारियों को इस तरह से व्यवस्थित किया है कि अन्य अधिकारियों की सक्रिय भागीदारी कम हो गई है।
उपयंत्रियों को मिला अतिरिक्त प्रभार
मामले में यह भी सामने आया है कि उपयंत्रियों को कार्यपालन यंत्री (Executive Engineer) का प्रभार सौंप दिया गया है। इस निर्णय पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि इससे तकनीकी और प्रशासनिक संतुलन प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
बोर्ड की भूमिका पर सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि IDA जैसे महत्वपूर्ण शहरी विकास संस्थान में सभी बोर्ड सदस्यों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक होती है। ऐसे में यदि निर्णय प्रक्रिया केंद्रीकृत होती है, तो पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर असर पड़ सकता है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
हालांकि इस पूरे मामले पर अभी तक IDA या संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन अंदरखाने इस मुद्दे को लेकर असंतोष बढ़ता दिख रहा है।
आगे क्या?
प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि यदि इस मामले में स्पष्टता नहीं आई, तो यह विवाद और गहरा सकता है। राज्य शासन स्तर पर भी इस पर नजर रखी जा रही है और आने वाले दिनों में किसी प्रकार की जांच या हस्तक्षेप संभव है।
यह घटनाक्रम इंदौर के विकास कार्यों पर भी असर डाल सकता है, ऐसे में अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि प्रशासन इस विवाद को किस तरह सुलझाता है।

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