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कोलकाता में कैसे बसे चीन के लोग, चुनाव में कितना अहम होता है इनका रोल?How did the Chinese community settle in Kolkata, and how significant is their role in elections


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में जैसे-जैसे राजनीतिक सरगर्मी बढ़ रही है, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) कोलकाता में चीनी समुदाय को खुश करने में जुटी है. पार्टी ने मैंडरिन भाषा में समर्थन की अपील करके उनसे संपर्क साधा है. टीएमसी के उम्मीदवार जावेद खान ने चाइनाटाउन के वोटरों से उनकी अपनी भाषा में संपर्क साधा और अपने अभियान को मजबूत करने के लिए टांगरा की दीवारों पर मैंडरिन भाषा में Graffiti बनवाई.


टांगरा 1920 के दशक में चमड़ा उद्योग का एक बड़ा केंद्र था. ये अब एक ऐसा इलाका बन गया है जहां कई रेस्टोरेंट हैं और जहां चीन के डिश मिलते हैं. पुरानी चीनी बस्ती मध्य कोलकाता के तिरेटा बाजार में स्थित है. कोलकाता की इनकी अनुमानित आबादी 3 से 4 हजार है.

एक वक्त में यहां पर 50 हजार चीनी लोग रहा करते थे. ज़्यादातर ने अपने बच्चों को विदेश भेज दिया है, जिसके कारण इनकी आबादी कम हो गई है. कई लोग अब भी कोलकाता में ही रहते हैं और इसे ही अपना घर मानते हैं.

कोलकाता में कब आए चीनी लोग?

इस समुदाय की जड़ें शहर में 18वीं सदी के आखिर तक फैली हुई हैं. उस समय सबसे पहले बसने वाले चीनी लोगों में से एक, टोंग आचू थे. वह 1778 में यहां आए थे और उन्होंने बज-बज के पास एक चीनी मिल शुरू की थी.

चाइनाटाउन इलाका

आचू को 45 रुपये सालाना किराए पर 650 बीघा ज़मीन दी गई थी. जिस जगह पर यह मिल बनी, उसे आचू के नाम पर ‘आचीपुर’ कहा जाने लगा, क्योंकि वहां के स्थानीय लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते थे. तब तक, तिरेटा बाज़ार में एक और चीनी बस्ती बस चुकी थी. यहां रहने वाले ज़्यादातर लोग फ़ुजियान और गुआंगडोंग प्रांत से आए थे और अफ़ीम के व्यापार से जुड़े हुए थे.

आचू की मौत के बाद, आचीपुर में रहने वाले ज़्यादातर चीनी लोग तिरेटा बाजार चले गए ताकि वे दूसरे लोगों के साथ मिल सकें. आचीपुर में आचू की कब्र और एक चीनी मंदिर आज भी मौजूद हैं. 19वीं सदी के मध्य तक, तिरेटा बाजार एक जीवंत चीनी मोहल्ला बन चुका था, जहां लोगों ने चमड़े के कारखाने, लॉन्ड्री, रेशम का काम, दंत चिकित्सा और ब्यूटी सैलून जैसे व्यवसायों में योगदान दिया.

किसको वोट करते हैं चीनी लोग?

इंडियन चाइनीज एसोसिएशन का कहना है कि चीनी लोग आमतौर पर मदद के लिए सरकार से संपर्क नहीं करते, क्योंकि यह समुदाय बहुत स्वतंत्र है; लेकिन ज़्यादातर लोग युवाओं के साथ मिलकर वोट देते हैं, क्योंकि वे राजनीतिक स्थिति के बारे में ज़्यादा जागरूक हैं.

कभी 50 हजार तक पहुंच गई थी आबादी

1962 के युद्ध से पहले यहां की आबादी 40,000 से भी ज़्यादा हो गई थी. उस युद्ध के दौरान, कई लोगों को चीनी एजेंट होने के शक में राजस्थान के देओली कैंपों में हिरासत में ले लिया गया था. रिहा होने पर कई लोगों ने पाया कि उनके घर और कारोबार खत्म हो चुके थे, जिसके चलते वहां से लोगों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया.

कोलकाता के तीन विधानसभा क्षेत्रों की 2002 की मतदाता सूची में शामिल कम से कम 484 चीनी-भारतीयों के नाम 2026 की लिस्ट से हटा दिए गए हैं. इन 484 में से लगभग 80% का पता नहीं लगाया जा सका, जबकि बाकी की मृत्यु हो गई.

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