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टकराव की उलटी गिनती: पश्चिम एशिया में सुलगती जंग और बेअसर होती दुनिया”Countdown to Conflict: The Smoldering War in West Asia and a Powerless World

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संपादकीय

पश्चिम एशिया अब सिर्फ तनाव का इलाका नहीं रहा—यह एक ऐसे बारूद के ढेर में बदल चुका है, जहां एक चिंगारी पूरे क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक सकती है। अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का टूटना इस बात का साफ संकेत है कि अब कूटनीति पीछे छूट रही है और टकराव की पटकथा तेजी से लिखी जा रही है।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दुनिया सच में शांति चाहती है, या सिर्फ अपने-अपने हितों की लड़ाई लड़ रही है? “नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था” की बात करने वाले देश खुद ही नियमों को अपने हिसाब से तोड़ते नजर आ रहे हैं। जब ताकत ही नियम तय करने लगे, तो व्यवस्था का अस्तित्व सिर्फ एक दिखावा बनकर रह जाता है।

स्थिति की गंभीरता को समझना मुश्किल नहीं है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ता तनाव सीधे-सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था की नस पर दबाव है। अगर यहां कोई बड़ा टकराव होता है, तो तेल आपूर्ति ठप हो सकती है, कीमतें आसमान छू सकती हैं और दुनिया एक नए आर्थिक संकट में धकेली जा सकती है।

लेकिन सबसे खतरनाक संकेत यह है कि अब “बातचीत” शब्द कमजोर पड़ता दिख रहा है और “जवाबी कार्रवाई” नई नीति बनती जा रही है। हर बयान में सख्ती, हर कदम में चुनौती—यह सब मिलकर उस दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं जहां से वापसी आसान नहीं होती।

इतिहास गवाह है कि पश्चिम एशिया की आग कभी सीमित नहीं रहती। यह संघर्ष अगर भड़का, तो इसमें कई देश खिंच सकते हैं और एक क्षेत्रीय संकट वैश्विक युद्ध की शक्ल ले सकता है। और सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इस खेल में सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं लोगों का होता है, जिनका इसमें कोई हाथ नहीं—आम नागरिक।

भारत के लिए भी यह सिर्फ दूर की लड़ाई नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और लाखों भारतीयों की मौजूदगी इस क्षेत्र को हमारे लिए बेहद संवेदनशील बनाती है। ऐसे में भारत को सिर्फ दर्शक बनकर नहीं, बल्कि संतुलित और मजबूत कूटनीतिक भूमिका निभानी होगी।

सच यह है कि दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। अगर अभी भी कूटनीति को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो अगला अध्याय युद्ध का हो सकता है—और उस युद्ध की कीमत सिर्फ सीमाओं पर नहीं, पूरी मानवता को चुकानी पड़ेगी।

अब फैसला दुनिया को करना है—संवाद की मेज या युद्ध का मैदान। क्योंकि दोनों एक साथ नहीं चल सकते।

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