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बंगाल में मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को हटाने का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कीCase regarding the removal of the Chief Secretary and Director General of Police in Bengal: Supreme Court dismisses petition.

 

कोलकाता/नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच बढ़ते अविश्वास को उजागर करते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें चुनाव आयोग द्वारा राज्य में 1000 से अधिक प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादलों को चुनौती दी गई थी। हालांकि अदालत ने यह कानूनी सवाल भविष्य के लिए खुला रखा कि क्या चुनाव वाले राज्यों में प्रशासनिक बदलाव से पहले चुनाव आयोग को राज्य सरकार से परामर्श करना जरूरी है या नहीं।


मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने कहा कि यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि अखिल भारतीय सेवाओं के गठन का उद्देश्य कमजोर पड़ रहा है।

मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण कार्य में अदालत को न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति करनी पड़ी क्योंकि दोनों पक्षों के बीच विश्वास की कमी है। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को चुनाव आयोग द्वारा भेजे गए अधिकारियों पर भरोसा नहीं है और चुनाव आयोग को राज्य के अधिकारियों पर विश्वास नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि 31 मार्च के कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की जा रही थी। इससे पहले कलकत्ता उच्च न्यायालय भी इस याचिका को खारिज कर चुका था।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने दलील दी कि पहली बार किसी राज्य के मुख्य सचिव का इस तरह तबादला किया गया है। उन्होंने कहा कि चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद लगभग 1100 अधिकारियों का एक साथ तबादला कर दिया गया।

अदालत ने इस तर्क पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है और न ही यह केवल एक ही राज्य में हुआ है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि चुनाव आयोग को ऐसे बड़े पैमाने पर तबादले करने से पहले राज्य सरकार से सलाह लेनी चाहिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि जिन अधिकारियों का तबादला हुआ है, वे सभी उसी राज्य की सेवा के अधिकारी हैं, तो फिर अंतर क्या पड़ता है।

अदालत ने यह भी कहा कि यह मुद्दा महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाता है, लेकिन इसे उचित मामले में तय किया जाएगा। फिलहाल इस विषय को खुला रखा गया है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अखिल भारतीय सेवाओं की भावना अपने मूल उद्देश्य से भटकती दिखाई दे रही है। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य के बाहर से पर्यवेक्षकों की नियुक्ति कोई नई बात नहीं है और यह चुनाव प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है।

अंत में अदालत ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और मामले को समाप्त कर दिया।

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