भोपाल : मध्यप्रदेश में समान नागरिक संहिता को लेकर प्रक्रिया शुरू हो गई है. राज्य सरकार ने प्रदेश में यूसीसी लागू करने की दिशा में कदम आगे बढ़ा दिया है. विधि एवं विधायी कार्य विभाग ने समान नागरिक संहिता के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन कर दिया है. यह समिति विभिन्न व्यक्तिगत और पारिवारिक कानूनों का 60 दिनों में अध्ययन करेगी ओर इसके बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगी.
इस तरह काम करेगी यह समिति
समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना प्रसाद देसाई के नेतृत्व में समिति के 5 सदस्य विभिन्न पहलुओं से जुड़े मुद्दे पर विचार करेगी. समिति में रिटायर्ड भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी शत्रुध्न सिंह, कानूनविद अनूप नायर, शिक्षाविद् गोपाल शर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता बुधपाल सिंह और सामान्य प्रशासन विभाग के अपर सचिव आईएएस अजय कटेसरिया रहेंगे. विधि व विधायी कार्य विभाग द्वारा जारी आदेश 8 बिंदुओं पर काम करने के निर्देश दिए गए हैं.
कहा गया है आदेश में?
आदेश में कहा गया है कि मौजूदा समय में नागरिकों के बीच समानता, न्याय, सामाजिक समरसता और विधिक स्पष्टता सुनिष्चित करने के लिए विवाह विच्छेद, भरण पोषण, उत्तराधिकार दत्तक ग्रहण और लिव इन संबंधों से जुड़े कानूनों की समीक्षा की जरूरत महसूस की जा रही है.
इन बिंदुओं पर काम करेगी कमेटी
प्रदेश में प्रचलित विभिन्न व्यक्तिगत और पारिवारिक विधियों जैसे विवाह, तलाक, भरण पोषण, दत्तक और लिव इन से जुड़ी व्यवस्थाएं शामिल हैं, इनका विस्तार से अध्ययन करना.
अन्य राज्यों खासतौर से उत्तराखंड और गुजरात में अपनाए गए माॅडल, प्रक्रिया का अध्ययनकर उपयुक्त बिंदुओं का परीक्षण करना.
राज्य के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए समान नागरिक संहिता के लिए एक संतुलित और व्यवहारिक एवं विधिक संरचना प्रस्तुत करना.
विभिन्न हितधारकों जैसे आम जनता, सामाजिक धार्मिक संगठन, विधि विशेषज्ञ, शैक्षणिक संस्थाओं आदि से इसको लेकर सुझाव, आपत्तियां बुलाकर उनका परीक्षण करना.
जरूरत होने पर जनसुनवाई, परामर्श बैठकें आयोजित कर व्यापाक तौर पर लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करना.
प्रदेश में लिव इन संबंधों की प्रक्रिया, उनके पंजीयन एवं उनसे पैदा होने वाले अधिकारों, दायित्यों के संबंधों में सुझाव प्रस्तुत करना.
इसे लेकर आने वाले विधेयक को लेकर किसी तरह के कानूनी, प्रशासनिक और इसे लागू करने से जुड़े पहलुओं का परीक्षण करना, ताकि भविष्य में किसी तरह की कानूनी अडचन पैदा न हो सके

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