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इंदौर हादसे से भी नहीं लिया सबक: 50 गांवों में “जहर” बन रहा पानी, फाइलों में सिमटी सफाई व्यवस्थाLessons not learned from the Indore disaster: Water in 50 villages is becoming "poisonous," sanitation remains confined to files.



एक तरफ सरकार ग्रामीण विकास और स्वच्छता के बड़े-बड़े दावे कर रही है, तो दूसरी ओर जबलपुर जनपद पंचायत के करीब 50 गांवों में हालात बेहद चिंताजनक बने हुए हैं। सालीवाड़ा गौर, नीमखेड़ा, खमरिया सहित कई गांवों में दूषित पानी लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन चुका है।

इंदौर जैसी घटनाओं से भी नहीं जागा प्रशासन

इंदौर में दूषित पानी से हुई गंभीर घटनाओं के बाद भी यहां का स्थानीय प्रशासन सुस्त नजर आ रहा है। गांवों में नालियों की सफाई नियमित नहीं हो रही, जिससे गंदा पानी सड़कों पर बह रहा है। यही पानी लीकेज पाइपलाइनों के जरिए घरों तक पहुंच रहा है—सीधे शब्दों में कहें तो लोग “जहर” पीने को मजबूर हैं।

 पुरस्कार पाने वाली पंचायत, लेकिन पानी बदहाल

सालीवाड़ा गौर पंचायत ने राजस्व वसूली में जिले में पहला स्थान हासिल किया, लेकिन विडंबना यह है कि यहां के ग्रामीणों को साफ पानी तक नसीब नहीं।

नल-जल योजना का पानी दूषित

पाइपलाइन जगह-जगह क्षतिग्रस्त

नालियों का गंदा पानी सप्लाई में मिल रहा

क्लोराइड युक्त पानी से बीमारियों का खतरा

खमरिया और आसपास के गांवों में लोग क्लोराइड युक्त पानी पीने को मजबूर हैं। इसके कारण:

सर्दी, जुकाम और बुखार के मरीज तेजी से बढ़ रहे

बच्चों और बुजुर्गों पर सबसे ज्यादा असर

लोग अब वैकल्पिक पानी की तलाश में भटक रहे

 स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी पर सवाल

ग्रामीणों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा।

कुओं में ब्लीचिंग पाउडर तक नहीं डाला जा रहा

जल स्रोतों की जांच नहीं

संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ता जा रहा

सफाई के नाम पर खर्च, जमीन पर गंदगी

हर महीने 40–50 हजार रुपये सफाई पर खर्च होने का दावा, लेकिन हकीकत:

नालियां कचरे से पटी

गंदा पानी सड़कों पर बह रहा

मेंटेनेंस के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति

ग्रामीणों में आक्रोश, प्रशासन पर भरोसा खत्म

पंचायत सचिव राजेश तिवारी और सरपंच सौरभ राय “शेंकी” सफाई और पाइपलाइन सुधार के दावे कर रहे हैं, लेकिन ग्रामीणों का गुस्सा कम नहीं हो रहा।

ग्रामीणों ने कलेक्टर से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग उठाई है।

यह मामला सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि ग्रामीणों के स्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। जब राजस्व वसूली में अव्वल पंचायत अपने ही लोगों को स्वच्छ पानी नहीं दे पा रही, तो यह सिस्टम की गंभीर विफलता को उजागर करता है।

 सवाल सीधा है:

क्या “हर घर नल-जल” सिर्फ कागजों में ही बह रहा है?

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