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केरल का ‘किंगमेकर’ कौन? 45% वोट बैंक पर टिकी तीनों दलों की किस्मतWho is Kerala's 'Kingmaker'? The Fate of All Three Parties Rests on a 45% Vote Bank.

 

केरल की 140 विधानसभा सीटों पर एक चरण में 9 अप्रैल को मतदान होगा। 4 मई को वोटों की गिनती होगी। इस बार प्रदेश की सियासत जटिल समीकरणों के इर्द-गिर्द घूम रही है। राजनीतिक दलों द्वारा हर समुदाय को लुभाने के लिए वादे भी किए जा रहे हैं। लेकिन प्रदेश की सत्ता की चाबी 45 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी के वोट में छिपी हुई है। माना जा रहा है कि अल्पसंख्यक वोट जिस पार्टी को जाता है, उसी की प्रदेश में सरकार बनती है।


अल्पसंख्यक वोट है गेम चेंजर

प्रदेश की कुल आबादी में करीब 26.60 प्रतिशत मुसलमान है। इनका मलप्पुरम, कोझिकोड और कासरगोड में खासा प्रभाव है। इसके अलावा कई सीटों पर भी इनका प्रभाव है। वहीं करीब 18.40 प्रतिशत ईसाई समुदाय मध्य केरल के कोट्टायम, इडुक्की और एर्नाकुलम जिलों में निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे में इन दोनों समुदायक का झुकाव किसी भी गठबंधन के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है। 

बीजेपी की ईसाई समुदाय पर फोकस

केरल में बीजेपी ने भी अपनी तैयारी तेज कर दी है। प्रदेश में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए बीजेपी इस बार ईसाई समुदाय पर फोकस कर रही है। इसके अलावा लव जिहाद और भूमि विवाद के मुद्दों के जरिए पार्टी मुस्लिम-ईसाई समीकरणों में दरार का फायदा उठाना चाहती है। 

वामपंथियों ने मुस्लिम वोट बैंक पर बनाई पकड

प्रदेश में सीएम पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला एलडीएफ ने मुस्लिम वोट बैंक पर पकड़ बनाई है। दरअसल, नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी का सीएम विजयन ने विरोध किया था। यही वजह है कि सीएम ने मुस्लिम वोट बैंक को अपनी तरफ किया है। इसके साथ ही केरल कांग्रेस (मणि) को साथ लाकर एलडीएफ ईसाई बहुल इलाकों में भी अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

कांग्रेस इन मुद्दों पर दे रही जोर

वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ अब भी मुस्लिम और ईसाई वोट बैंक का पारंपरिक दावेदार माना जाता है। इंडियन यूनियन मुस्लिम लिग उसके लिए मजबूत स्तंभ बनी हुई है, जबकि कुछ इस्लामी संगठनों का समर्थन भी उसे बढ़त दिलाता रहा है। ईसाई वोटरों को साधने के लिए कांग्रेस अब रबर किसानों और महंगाई जैसे ‘खेत और पेट’ के मुद्दों पर जोर दे रही है।

साइलेंट वोट तय करेगा किसे मिलेगी सत्ता की चाबी

फिलहाल राज्य में अल्पसंख्यक वोटर खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं। यह खामोशी ही चुनाव का सबसे बड़ा फैक्टर मानी जा रही है। मतदान के दिन यही साइलेंट वोट तय करेगा कि सत्ता का रास्ता किसके लिए खुलेगा और किसके लिए बंद हो जाएगा।

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